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मध्य प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था से बड़ा खिलवाड़

मध्य प्रदेश में शिक्षा गुणवत्ता की कमान अब एक–दो साल अनुभव वाले स्नातक अधिकारियों के हाथों!

भोपाल। मध्य प्रदेश में स्कूली शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर ऐसा फैसला सामने आया है, जिसने प्रदेश के एक करोड़ से अधिक विद्यार्थियों के भविष्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) द्वारा 29 दिसंबर को 31 नव नियुक्त सहायक संचालकों को अतिरिक्त जिला परियोजना समन्वयक (ADPC) के पदों पर पदस्थ करने के आदेश जारी किए गए हैं।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये सभी अधिकारी मात्र स्नातक योग्यताधारी हैं और अधिकांश के पास केवल एक से दो वर्ष का प्रशासनिक अनुभव है, जबकि जिन शिक्षकों और प्राचार्यों के अधीन इन्हें कार्य करना है, वे स्वयं स्नातकोत्तर, बी.एड., एम.एड. और कई तो पीएचडी धारक हैं।

योग्यता बनाम प्रयोग: शिक्षा व्यवस्था से खिलवाड़

मध्य प्रदेश में हाईस्कूल एवं हायर सेकेंडरी स्तर पर पढ़ाने वाले शिक्षक अनिवार्य रूप से स्नातकोत्तर एवं बी.एड. योग्यताधारी होते हैं। पूर्व में स्पष्ट नीति रही है कि कम से कम 5 वर्ष अनुभव वाला प्राचार्य ही सहायक संचालक जैसे महत्वपूर्ण पद पर पदोन्नत होता था, क्योंकि शिक्षा गुणवत्ता एक तकनीकी एवं अकादमिक क्षेत्र है।
इसके बावजूद, सभी नियमों, परंपराओं और तार्किक मानकों को दरकिनार करते हुए लोक शिक्षण संचालनालय में पहले से ही 20 से 25 मात्र स्नातक अधिकारी निर्णायक पदों पर बैठा दिए गए हैं, जिन्होंने अपने “प्रयोगधर्मी निर्णयों” से प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को प्रयोगशाला बना दिया है।

बोर्ड परीक्षा से पहले बड़ा प्रशासनिक जोखिम

सबसे गंभीर पहलू यह है कि बोर्ड की वार्षिक परीक्षाओं में अब मुश्किल से एक माह का समय शेष है, और ऐसे संवेदनशील समय में प्रदेश के 55 में से 49 जिलों की शैक्षणिक कमान ऐसे अधिकारियों को सौंप दी गई है, जिन्हें न तो विषयगत गहराई का अनुभव है और न ही शैक्षणिक नेतृत्व का।
अन्य विभागों से तुलना में शिक्षा विभाग ‘अनोखा’ है इस संदर्भ में यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि_ मेडिकल कॉलेज का प्रमुख अनिवार्य रूप से मेडिकल फील्ड से होता है,
इंजीनियरिंग कॉलेज का प्राचार्य पहले प्राध्यापक रहा होता है,
लेकिन मध्य प्रदेश का स्कूल शिक्षा विभाग अपने आप में अनोखा प्रयोग करता है, जहां शिक्षा के विशेषज्ञों को किनारे कर प्रशासनिक नवागंतुकों को जिम्मेदारी सौंप दी जाती है—भले ही इसका खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़े।

नियुक्तियां न्यायालय के अधीन, फिर भी जिम्मेदारी सौंपने की जल्दबाजी

यह भी महत्वपूर्ण है कि इन नव नियुक्त ADPC अधिकारियों की नियुक्ति परिवीक्षा पर की गई है और माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय के अधीन है। इन नियुक्तियों के विरुद्ध चार से अधिक याचिकाएं उच्च न्यायालय में लंबित हैं, वहीं मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।

पीछे के दरवाजे से DEO बनाने की साजिश?

सूत्रों के अनुसार, इससे पहले भी इन स्नातक योग्यताधारी परिवीक्षाधीन अधिकारियों को जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) का प्रभार देने का प्रयास किया गया था, लेकिन अनुभवी प्राचार्यों एवं उनके संगठनों के तीव्र विरोध के चलते वह प्रयास विफल हो गया।
इसके बाद भले ही प्राचार्यों को DEO के रिक्त पदों पर उच्च पद प्रभार हेतु काउंसलिंग के लिए बुलाया गया, लेकिन आज दिनांक तक किसी की भी पदस्थापना नहीं की गई।
अब ADPC के पदों पर पदस्थ कर इन्हीं अधिकारियों को “पिछले दरवाजे से” जिलों में DEO का प्रभार सौंपने की जमीन तैयार की जा रही है, जो न केवल नियमों की अवहेलना है बल्कि शिक्षा प्रशासन के साथ खुला खिलवाड़ भी।

चयनित प्राचार्यों की अनदेखी

गौरतलब है कि लोक शिक्षण संचालनालय के पत्र क्रमांक 1686 दिनांक 17.06.2025 के तहत चयनित उमावि एवं हाईस्कूल प्राचार्यों को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था, किंतु न तो उनमें से किसी को ADPC बनाया गया और न ही दूसरी सूची जारी की गई।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि—क्या शिक्षा विभाग जानबूझकर अनुभव और योग्यता को दरकिनार कर रहा है?
क्या विद्यार्थियों का भविष्य प्रशासनिक प्रयोगों की भेंट चढ़ाया जा रहा है? और क्या आने वाले समय में यह निर्णय प्रदेश की शिक्षा गुणवत्ता को और रसातल में ले जाएगा?

अब देखना यह है कि मध्य प्रदेश का स्कूल शिक्षा विभाग आगे और कौन-कौन से “नए प्रयोग” करता है, और क्या शासन-प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर समय रहते संज्ञान लेता है या नहीं।