युवा शक्ति : चाटुकार बनेगी तो चरित्रहीन राष्ट्र बनेगा..
“तक़दीर उधर ही मर जाती है, जिधर जवानी गलत दिशा में चल पड़ती है।”
बृजराज एस तोमर। यह केवल पंक्ति नहीं, आज के भारत के लिए खतरे की घंटी है। राष्ट्रीय युवा दिवस पर स्वामी विवेकानंद को नमन करते हुए हमें आत्मप्रशंसा नहीं, आत्मालोचना करनी होगी। स्वामी विवेकानंद ने जिस युवा भारत की कल्पना की थी, वह निर्भीक, चरित्रवान और राष्ट्र के लिए तप करने वाला था।
किंतु आज का यथार्थ यह है कि बड़ी संख्या में युवा संघर्ष से नहीं, सिफारिश से; विचार से नहीं, व्यक्ति-पूजा से और योग्यता से नहीं, बल्कि चाटुकारिता से आगे बढ़ने का सपना देख रहे हैं।
नेता पुत्रों की परिक्रमा और सत्ता की चरण-वंदना
आज का युवा प्रश्न नहीं पूछता, क्योंकि प्रश्न करने से ‘दरबार’ नाराज़ हो सकता है।
आज का युवा अन्याय के विरुद्ध नहीं खड़ा होता, क्योंकि कहीं अवसर छिन न जाए।
यह वही पीढ़ी है जो प्रभावशाली नेताओं के पुत्रों के आगे झुकना और अफसरों की चापलूसी को “नेटवर्किंग” कहकर स्वयं को भ्रमित कर रही है।
स्वामी विवेकानंद ने ऐसे युवाओं को पहले ही चेताया था—
“जो सत्य के लिए खड़ा नहीं हो सकता, वह राष्ट्र के लिए बोझ है।”
रील संस्कृति बनाम राष्ट्र संस्कृति
आज युवा शक्ति का बड़ा हिस्सा—सोशल मीडिया की रील संस्कृति में उलझा है, दिखावे को संघर्ष समझ रहा है, तात्कालिक प्रसिद्धि को जीवन लक्ष्य मान बैठा है।
जबकि विवेकानंद कहते थे—
“महान कार्य एकांत में तप से जन्म लेते हैं, भीड़ की तालियों से नहीं।”
यदि युवा इसी भ्रम में रहा तो आने वाला भारत ऊर्जावान नहीं, अवसरवादी होगा।
चाटुकारिता : राष्ट्र का सबसे बड़ा शत्रु
कोई भी राष्ट्र बाहरी दुश्मनों से नहीं, बल्कि अंदरूनी चरित्रहीनता से टूटता है।
आज यदि युवा—सत्ता से सवाल पूछने के बजाय जयकारे लगाए, अन्याय देखकर मौन साध ले और सिद्धांतों को नौकरी व पद के बदले गिरवी रख दे तो यह मान लेना चाहिए कि
विवेकानंद का भारत नहीं, दरबारी भारत बन रहा है।
स्वामी विवेकानंद की ओजस्वी चेतावनियाँ जो आज भी झकझोरती हैं
🔸 “कमज़ोर होना पाप है।”
आज युवा आत्मबल नहीं, शॉर्टकट ढूंढ रहा है।
🔸 “चरित्र निर्माण ही राष्ट्र निर्माण है।”
आज चरित्र से अधिक पहचान और प्रभावशाली संपर्क अहम हो गया है।
🔸 “जो अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता, वह समाज को क्या देगा?”
आज आत्मनिर्भरता के स्थान पर परजीविता पनप रही है।
युवा दिवस पर कठोर आह्वान
राष्ट्रीय युवा दिवस पर फूल चढ़ाने से अधिक जरूरी है_ भ्रम त्यागना।
युवा तय करे_वह दरबार की शोभा बनेगा या राष्ट्र की रीढ़!
वह चापलूस कहलाएगा या चरित्रवान !
वह सत्ता का उपभोक्ता बनेगा या समाज का निर्माता!
क्योंकि_तक़दीर वहीं बनती है,जहाँ जवानी चरित्र के साथ चलती है अर्थात तकदीर उधर मुड़ जाती है जिस ओर जवानी चलती है।
“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए “। स्वामी विवेकानंद ने युवा शक्ति को राष्ट्र की रीढ़ बताया था। वे कहते थे_“मुझे सौ ऊर्जावान युवा दे दो, मैं भारत का भाग्य बदल दूंगा।”
स्वामी विवेकानंद को यही सच्ची श्रद्धांजलि_
आज स्वामी विवेकानंद को नमन करने का अर्थ है_ डर के विरुद्ध खड़ा होना, सत्य के पक्ष में बोलना और चाटुकारिता को सार्वजनिक रूप से नकारना।
यदि युवा नहीं जागा, तो राष्ट्र को जगाने वाला कोई नहीं बचेगा।
