नवागत आयुक्त द्विवेदी के फैसले से राजस्व सुरक्षा पर सवाल
भोपाल। मध्य प्रदेश वाणिज्य कर विभाग में नए आयुक्त अनय द्विवेदी द्वारा अब तक एंटी इवेज़न ब्यूरो (AEB) सहित किसी भी विंग को “चेकिंग पावर” नहीं दिए जाने से विभागीय कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है। मौजूदा स्थिति में न तो व्यापारियों के मालवाहक वाहनों की जांच संभव है और न ही किसी प्रतिष्ठान पर छापामार कार्रवाई—ऐसे में टैक्स चोरी पर अंकुश कैसे लगेगा, यह सबसे बड़ा सवाल बनकर उभरा है।
सूत्रों के अनुसार आयुक्त ने विभाग को पूरी तरह ऑनलाइन प्रक्रिया पर अपडेट रहने के निर्देश दिए हैं। निस्संदेह, डिजिटल मॉनिटरिंग पारदर्शिता और कार्यों में गति लाने का प्रभावी माध्यम है, लेकिन जमीनी स्तर की चेकिंग और छापामार कार्रवाई के बिना राजस्व वृद्धि का लक्ष्य अधूरा माना जाता है।
क्या केवल ऑनलाइन निगरानी पर्याप्त है?
जीएसटी ढांचे में ई-वे बिल, रिटर्न और डेटा एनालिटिक्स अहम औजार हैं, परंतु अनुभवी अधिकारियों का कहना है कि डेटा-आधारित संकेतों की पुष्टि फील्ड एक्शन से ही होती है। यदि फील्ड जांच ठप है, तो संदिग्ध लेनदेन कागजों में सिमटकर रह सकते हैं और राजस्व रिसाव बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
पूर्व कमिश्नर का मॉडल: संतुलित अधिकार, ठोस परिणाम
पूर्व आयुक्त धनराजू एस ने “चेकिंग पावर” के सफल प्रयोग करते हुए एईबी और सर्किल स्तर को अलग-अलग प्राथमिकता के आधार पर अधिकार सौंपे थे। उस दौर में लक्षित कार्रवाई, डेटा-आधारित छापे और फील्ड सत्यापन के संयोजन से उल्लेखनीय परिणाम सामने आए थे। विभागीय हलकों में माना जाता है कि संतुलित अधिकार-वितरण और जवाबदेही ने तब राजस्व संग्रह में गति दी थी।
पूर्वाग्रह या प्रशासनिक संकोच?
किसी व्यवस्था को “कुख्यात” या “प्रख्यात” की छवि के आधार पर शून्य मान लेना—क्या यह व्यावहारिक प्रशासन है? विशेषज्ञों का मत है कि यदि सरकार ने टैक्स चोरी रोकने और वसूली बढ़ाने के लिए चेकिंग को प्रावधान में अहमियत दी है, तो उसे दरकिनार करना न तो न्यायसंगत है और न ही व्यवहारिक।
सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या मॉनिटरिंग अधिकारियों की क्षमता और प्रशासनिक योग्यता पर भरोसा कम हुआ है, या फिर किसी संभावित विवाद से बचने की रणनीति अपनाई गई है? यदि ऐसा है, तो पारदर्शी गाइडलाइन और सख्त ऑडिट-ट्रेल के साथ चेकिंग पावर बहाल कर संतुलन बनाया जा सकता है।
राजस्व बनाम सुविधा_संतुलन जरूरी
डिजिटल सुधार स्वागतयोग्य हैं, परंतु राजस्व सुरक्षा और कर-चोरी पर नियंत्रण विभाग का मूल दायित्व है। केवल ऑनलाइन प्रक्रिया पर निर्भरता, बिना फील्ड-एक्शन के, लंबी अवधि में जोखिमपूर्ण साबित हो सकती है।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि आयुक्त द्विवेदी कब और किस प्रारूप में चेकिंग पावर को लेकर स्पष्ट नीति सामने लाते हैं। क्योंकि सवाल सीधा है—अगर जांच और छापे नहीं होंगे, तो टैक्स चोरी पर लगाम कैसे लगेगी ?
* आयुक्त का फोटो एआई जेनरेटेड है रियल नहीं
