RSS जैसे संगठनों पर अप्रत्यक्ष रोक का आदेश आधी रात में स्थगित, मुख्यमंत्री की निर्णय क्षमता पर उठे सवाल
रायपुर 23 अप्रैल 2026। छत्तीसगढ़ में 21 अप्रैल को जारी हुआ शासकीय कर्मचारियों के लिए विवादित आदेश महज 24 घंटे के भीतर ही बैकफुट पर आ गया। सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी इस आदेश में कर्मचारियों को किसी भी संगठन से जुड़ने और उसकी गतिविधियों में भाग लेने पर रोक लगाई गई थी, जिसके बाद 22 अप्रैल की देर रात इसे स्थगित करना पड़ा।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि सरकार को संघ एवं संगठनों में भागीदारी से क्यों परहेज दिखा और फिर रातों-रात अपना ही आदेश रोकना पड़ा?
भाजपा सरकार में ऐसा फैसला कैसे?
आदेश की भाषा और दायरे को लेकर शुरुआत से ही असहजता थी। यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि जब प्रदेश में भाजपा की सरकार है, तो फिर ऐसा आदेश कैसे जारी हो गया, जिससे वैचारिक संगठनों—जिनमें राष्ट्रीय स्तर के संगठन भी शामिल हैं—की गतिविधियों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता दिखा।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि क्या यह निर्णय सरकार के शीर्ष स्तर तक सही तरीके से प्रस्तुत ही नहीं किया गया था, या फिर कुछ वामपंथी विचारों के प्रभावशाली तंत्र ने सरकार को गुमराह करते हुए संगठनों में सहभागी रहने पर प्रतिबंधात्मक आदेश दिया और फिर भाजपा हाईकमान अथवा आरएसएस के दबाव में अपना ही फैसले पर लगाम कसनी पड़ी।
आधी रात में मंत्रालय खुलवाने की नौबत क्यों?
22 अप्रैल को देर रात मंत्रालय खुलवाकर आदेश स्थगित करने की कार्रवाई अपने आप में असामान्य मानी जा रही है। सूत्रों के अनुसार, आदेश के बाद तेजी से बढ़ते विरोध और असंतोष ने सरकार को तत्काल कदम उठाने पर मजबूर कर दिया।
यह घटनाक्रम इस ओर इशारा करता है कि सरकार के भीतर समन्वय का अभाव है लिहाजा आदेश जारी करते समय जमीनी और वैचारिक प्रभावों का आकलन ठीक से नहीं किया गया। इस तरह की इतनी बड़ी प्रशासनिक घोषणा और फिर 24 घंटे के भीतर ही उसे स्थगित करना—यह सीधे तौर पर सरकार के भीतर समन्वय और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करता है। क्या यह फ़ैसला जल्दबाजी में लिया गया था? या फिर सरकार के भीतर ही अलग-अलग विचारधाराओं का टकराव सामने आ रहा है?
मुख्यमंत्री की भूमिका पर सवाल
मुख्यमंत्री विष्णु देव सहाय की भूमिका पर चर्चाएं जोरों पर है और पूरे घटनाक्रम के बाद नजरें सहाय पर टिक गई हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या उन्हें इस आदेश की व्यापकता और उसके संभावित असर की पूरी जानकारी थी, या फिर उन्हें बाद में स्थिति संभालनी पड़ी।
आदेश स्थगित हो चुका है, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में एक बड़ा प्रश्न अब भी गूंज रहा है_ क्या इस पूरे प्रकरण की जवाबदेही तय होगी? और क्या भविष्य में ऐसे संवेदनशील फैसलों से पहले व्यापक विचार-विमर्श किया जाएगा?
छत्तीसगढ़ में यह पूरा घटनाक्रम केवल एक आदेश और उसके स्थगन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकार की अंदरूनी कार्यप्रणाली, निर्णय प्रक्रिया और वैचारिक संतुलन पर बड़ा सवाल बनकर उभरा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है।
