कलियासोत के जलग्रहण क्षेत्र में प्राकृतिक जलधाराओं के अस्तित्व पर संकट, एनजीटी से सीमांकन और अवैध निर्माणों पर निर्णायक कार्रवाई की मांग
भोपाल। राजधानी भोपाल में प्राकृतिक जलधाराओं और उनके जलग्रहण क्षेत्रों पर अतिक्रमण का मुद्दा एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। भोजपुर रोड क्षेत्र से गुजरने वाली घुंसी नदी ( जिसे स्थानीय स्तर पर झांसी या घांसी नदी भी कहा जाता है) के किनारों पर कथित अतिक्रमण, मिट्टी की भराई और निर्माण गतिविधियों की शिकायतें सामने आ रही हैं। कलियासोत नदी से जुड़ी इस बरसाती जलधारा के प्राकृतिक बहाव पर किसी भी तरह की छेड़छाड़ का सीधा असर आसपास के गांवों, खेतों और बस्तियों पर पड़ सकता है।
इस पूरे मामले में 11 मील के पास स्थित आकृति एक्वासिटी टाउनशिप से गुजरने वाली जलधारा के क्षेत्र को भी जांच और सीमांकन के दायरे में शामिल किए जाने की जरूरत है। हालांकि, टाउनशिप के किसी हिस्से में नदी की जमीन पर अतिक्रमण होने का अंतिम निष्कर्ष राजस्व अभिलेखों, नदी के प्रमाणित नक्शे और मौके की जांच के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
नदी का प्राकृतिक रास्ता किसने और कितना बदला?
घुंसी नदी का जलप्रवाह मुख्यतः बरसात पर निर्भर रहता है। गर्मियों में जलधारा सूखने के बाद नदी की तलहटी और किनारों पर मिट्टी डालकर जमीन समतल करने, अस्थायी मेढ़ बनाने अथवा निर्माण सामग्री जमा करने की शिकायतें गंभीर जांच की मांग करती हैं। यदि ऐसे कार्य नदी के वास्तविक बहाव क्षेत्र में किए गए हैं, तो मानसून के दौरान पानी के प्राकृतिक रास्ते में बाधा पैदा हो सकती है।
छान गांव के आसपास बारिश के समय जलभराव और बाढ़ जैसी परिस्थितियों का मुद्दा भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जलभराव के पीछे अत्यधिक वर्षा, प्राकृतिक जलनिकासी की सीमाएं और मानवीय हस्तक्षेप—इनमें से किन कारकों की कितनी भूमिका है।
भोजपुर रोड और कलियासोत डैम के आसपास भी नदी किनारों पर मिट्टी-पत्थर की भराई, रिटेनिंग वॉल, बाउंड्री वॉल तथा अन्य निर्माणों को लेकर उठ रहे सवालों की स्वतंत्र जांच जरूरी है। सवाल किसी एक परियोजना का नहीं, बल्कि पूरी प्राकृतिक जलनिकासी व्यवस्था को सुरक्षित रखने का है।
11 मील के पास आकृति एक्वासिटी की स्थल जांच जरूरी
आकृति एक्वासिटी के आसपास और टाउनशिप से गुजरने वाली बताई जा रही जलधारा के संबंध में प्रशासन को कुछ बुनियादी सवालों के जवाब सार्वजनिक करने चाहिए—
- राजस्व और जल संसाधन विभाग के मूल नक्शों में घुंसी नदी तथा उसकी सहायक जलधाराओं का वास्तविक मार्ग क्या दर्ज है?
- क्या टाउनशिप के आसपास नदी के पाट, बहाव क्षेत्र अथवा प्राकृतिक नालों में मिट्टी की भराई या निर्माण हुआ है?
- क्या संबंधित निर्माणों की स्वीकृति देते समय नदी की सीमा, जलभराव क्षेत्र और लागू पर्यावरणीय प्रतिबंधों का पालन किया गया?
- क्या मौके की स्थिति और स्वीकृत नक्शों का मिलान करने के लिए संयुक्त सर्वे कराया गया है?
- यदि किसी हिस्से में अतिक्रमण पाया जाता है, तो जिम्मेदार पक्षों के विरुद्ध क्या कार्रवाई प्रस्तावित है?
इन सवालों का जवाब केवल कागजी रिपोर्ट से नहीं, बल्कि राजस्व नक्शों, उपग्रह चित्रों, पुराने हवाई चित्रों और मौके के संयुक्त निरीक्षण से सामने आ सकता है। आकृति एक्वासिटी सहित पूरे प्रभावित क्षेत्र का सर्वे होने पर ही यह स्पष्ट होगा कि नदी का मूल मार्ग कहां था और वर्तमान में उसकी स्थिति क्या है।
एनजीटी से निर्णायक हस्तक्षेप की अपेक्षा
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के समक्ष नदी, जलाशय और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई का प्रश्न उठाया जा सकता है। ऐसे में घुंसी नदी और कलियासोत के जलग्रहण क्षेत्र के संबंध में उपलब्ध शिकायतों, पूर्व आदेशों और सर्वे रिपोर्टों की स्थिति सार्वजनिक करना महत्वपूर्ण होगा।
जिला प्रशासन, भोपाल नगर निगम, राजस्व विभाग, जल संसाधन विभाग और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अपने-अपने अधिकार क्षेत्र के अनुसार समन्वित जांच करनी चाहिए। नदी की प्रमाणित सीमा तय कर वास्तविक अतिक्रमण चिह्नित किए जाएं, निर्माण अनुमतियों की जांच हो और जहां उल्लंघन प्रमाणित हो, वहां कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।
कलियासोत नदी और उसकी सहायक जलधाराओं के किनारे सैकड़ों निर्माणों को नोटिस जारी किए जाने के दावे भी सामने आते रहे हैं। लेकिन इस संबंध में संबंधित आदेशों, नोटिसों की संख्या, प्रभावित स्थानों और वर्तमान कानूनी स्थिति का आधिकारिक रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए। किसी निर्माण पर न्यायालय से स्थगन आदेश लागू है या नहीं, इसकी जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई की जा सकती है।
आज नदी की जमीन बची तो कल बस्तियां सुरक्षित रहेंगी
नदी का सूखा दिखाई देना उसकी जमीन को खाली या निर्माण योग्य नहीं बना देता। बरसाती जलधाराओं का महत्व उनके पूरे जलग्रहण क्षेत्र और पानी के प्राकृतिक निकास से जुड़ा होता है। यदि बहाव क्षेत्र संकरा होता है या निकासी मार्ग अवरुद्ध होता है, तो भारी बारिश में पानी आसपास की जमीन पर फैल सकता है।
इसलिए घुंसी नदी के मामले में प्रशासन को केवल दिखाई देने वाले निर्माणों तक सीमित रहने के बजाय पूरी जलधारा का वैज्ञानिक सीमांकन कराना चाहिए। 11 मील के पास आकृति एक्वासिटी से लेकर छान गांव और कलियासोत से जुड़ने वाले क्षेत्र तक एक समग्र सर्वे नदी के वास्तविक स्वरूप और अतिक्रमण संबंधी आरोपों की जांच में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
एनजीटी और जिला प्रशासन के सामने अब मुख्य चुनौती यह है कि प्राकृतिक जलधारा को राजस्व रिकॉर्ड, पर्यावरणीय मानकों और मौके की वास्तविक स्थिति के आधार पर सुरक्षित किया जाए। अतिक्रमण जहां प्रमाणित हो, वहां प्रभावी कार्रवाई हो और जहां आरोप अपुष्ट हों, वहां निष्पक्ष जांच से स्थिति स्पष्ट की जाए। नदी का रास्ता सुरक्षित रखना केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा और भविष्य की जलनिकासी व्यवस्था का भी सवाल है।
