12192 श्रीधाम एक्सप्रेस से युग क्रांति की पड़ताल
जबलपुर/भोपाल। देशभर में रेल सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों का मखौल उड़ाती नजर आ रही है। अब हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि जिस वातानुकूलित (AC) श्रेणी को सबसे सुरक्षित माना जाता था, वही आज लापरवाही, अवैध गतिविधियों और सुरक्षा खामियों का अड्डा बनती जा रही है।
युगक्रांति समाचारपत्र के संवाददाता ने यात्रियों की लगातार मिल रही शिकायतों की पुष्टि के लिए 23 अप्रैल 2026 को जबलपुर से 12192 श्रीधाम एक्सप्रेस में सफर किया। पीएनआर 8935548506, कोच बी-6, सीट नंबर 33 से शुरू हुई इस यात्रा में जो सामने आया, वह बेहद चौंकाने वाला और चिंताजनक है।
एसी कोच में ‘कोरियर सर्विस’: अटेंडेंट बना दलाल
जांच के दौरान पाया गया कि एसी कोच में तैनात अटेंडेंट यात्रियों की सेवा के बजाय ‘कोरियर एजेंट’ की भूमिका निभा रहे हैं। वे खुलेआम लगेज और पार्सल लेकर गंतव्य तक पहुंचाने के नाम पर मोटी रकम वसूल रहे हैं। यह सामान कोच में बेडरोल और अन्य स्टोरेज स्थानों में छुपाकर रखा जाता है, जिससे किसी को शक न हो।
नाम न छापने की शर्त पर एक कर्मचारी ने खुलासा किया कि इस अवैध कमाई में “ऊपर तक हिस्सेदारी” तय है, इसलिए न कोई चेकिंग होती है और न ही रोक-टोक। सबसे गंभीर बात यह है कि बिना किसी जांच के इस तरह का सामान ले जाना यात्रियों की सुरक्षा के साथ खुला खिलवाड़ है — क्योंकि इसी रास्ते किसी भी खतरनाक या आपत्तिजनक वस्तु को आसानी से भेजा जा सकता है।
बिना टिकट यात्रियों से भरे एसी डिब्बे
जांच में यह भी सामने आया कि बी-6 सहित अन्य एसी कोचों में बड़ी संख्या में ऐसे यात्री सफर कर रहे थे, जिनके पास वैध एसी टिकट तक नहीं था।
हैरानी की बात यह है कि इन्हें रोकने या बाहर करने के लिए रेलवे की ओर से कोई प्रभावी व्यवस्था नजर नहीं आई। टीटीई और सुरक्षा अमला पूरी तरह नदारद दिखा, जिससे नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ती रहीं।
किन्नरों की टोली का आतंक, यात्रियों से जबरन वसूली
स्थिति तब और भयावह हो गई जब जबलपुर से इटारसी के बीच किन्नरों की एक टोली एसी कोच में घुस आई।
इस टोली ने यात्रियों के साथ अभद्रता करते हुए खुलेआम जबरन वसूली शुरू कर दी। यात्रियों में भय और असहजता साफ देखी गई, लेकिन इस दौरान कहीं भी रेलवे सुरक्षा बल (RPF) या अन्य सुरक्षा व्यवस्था नजर नहीं आई।
सवालों के घेरे में रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था
यह पूरा घटनाक्रम कई गंभीर सवाल खड़े करता है—
क्या रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है?
क्या अधिकारियों की मिलीभगत से ही ये अवैध गतिविधियां फल-फूल रही हैं?
और सबसे बड़ा सवाल— क्या यात्रियों की जान अब भगवान भरोसे है?
युग क्रांति की यह पड़ताल रेलवे प्रशासन के दावों और जमीनी सच्चाई के बीच गहरे अंतर को उजागर करती है। अब देखना यह होगा कि इस खुलासे के बाद रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी कोई ठोस कार्रवाई करते हैं या फिर यह मामला भी अन्य घटनाओं की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?
