जवाब मांगने वाले ही चर्चा से पीछे हटे? राहुल गांधी के बदले रुख पर उठे सवाल, जनता पूछ रही_संसद चलाने भेजा था या हंगामा करने?
नई दिल्ली 12 अगस्त 2026। संसद के मानसून सत्र का कल आखिरी दिन है और पूरे सत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यदि किसी एक बात को कहा जाए तो वह कानून बनाने या जनहित के मुद्दों पर गंभीर बहस नहीं, बल्कि संसद के बार-बार ठप होने की कहानी है। विपक्ष ने लगातार हंगामा किया, सदन की कार्यवाही बाधित की और कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा का अवसर ही नहीं बनने दिया।
इस पूरे गतिरोध में अब तक जनता के करीब 116 करोड़ रुपये फिजूल खर्च हो चुके हैं। यह पैसा किसी राजनीतिक दल का नहीं, देश के करदाताओं का है। सवाल इसलिए बड़ा है कि आखिर इस बर्बादी की जिम्मेदारी कौन लेगा?
अमित शाह से जवाब चाहिए था, जवाब देने को तैयार हुए तो सवाल बदल गया
विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी, लगातार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की संसद में मौजूदगी और छात्रों से जुड़े मुद्दे पर जवाब की मांग करता रहा। कई दिनों तक सदन में हंगामा हुआ और कार्यवाही बाधित होती रही। सरकार की ओर से जब इस मुद्दे पर संसद में चर्चा और जवाब देने की तैयारी दिखाई गई तो स्वाभाविक रास्ता यही था कि विपक्ष सदन में मौजूद रहता, सवाल रखता और गृह मंत्री से जवाब मांगता। लेकिन इसके बजाय अब राहुल गांधी की ओर से यह सवाल उठाया जा रहा है कि जंतर-मंतर पर छात्रों के खिलाफ कथित बल प्रयोग किसके आदेश पर हुआ और प्रधानमंत्री को इसके लिए माफी मांगनी चाहिए।
यहीं से विपक्ष की रणनीति पर गंभीर सवाल खड़ा होता है। अगर सवाल जंतर-मंतर पर हुई कार्रवाई का है तो उसका जवाब संसद में ही मांगा जा सकता है। संसद में मंत्री से पूछा जा सकता है कि पुलिस ने क्या कार्रवाई की, किसके निर्देश पर की, कौन जिम्मेदार था और सरकार इस पर क्या कदम उठाएगी। विपक्ष अपने तथ्य रख सकता है, सरकार जवाब दे सकती है और आवश्यकता पड़ने पर आगे की जांच या कार्रवाई की मांग भी की जा सकती है। फिर सवाल यह है कि जब जवाब लेने का संवैधानिक और लोकतांत्रिक मंच संसद ही है तो उसी संसद को चलने से रोकने की जिद आखिर क्यों?
राहुल गांधी यदि यह कहते हैं कि उन्हें भाषण नहीं, जवाब चाहिए, तो सवाल यह है कि जवाब बिना चर्चा के मिलेगा कैसे? संसद में सवाल होगा, मंत्री जवाब देंगे, विपक्ष उस जवाब को चुनौती देगा और देश तय करेगा कि किसका पक्ष मजबूत है। लेकिन यदि सदन में चर्चा ही नहीं होगी तो जवाब आएगा कहां से? यही विरोधाभास अब विपक्ष की राजनीति को कठघरे में खड़ा कर रहा है।
116 करोड़ का सवाल सिर्फ भाजपा या कांग्रेस का नहीं, जनता का है
संसद सत्ता पक्ष और विपक्ष की राजनीतिक कुश्ती का अखाड़ा नहीं है। यह देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है, जहां जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए भेजती है कि वे उसके सवाल उठाएं, सरकार से जवाब मांगें और कानूनों पर बहस करें। लेकिन जब वही सदन हंगामे के कारण बार-बार स्थगित होता है तो नुकसान सिर्फ संसदीय कामकाज का नहीं होता, जनता के पैसे और लोकतंत्र दोनों का होता है।
करीब 116 करोड़ रुपये का संसदीय समय बर्बाद होना कोई छोटी बात नहीं है। यह रकम देश के करोड़ों नागरिकों के टैक्स से आती है। जनता यह पूछने का अधिकार रखती है कि जिस संसद को चलाने के लिए वह पैसा देती है, वहां उसके प्रतिनिधि कितने घंटे चर्चा कर रहे हैं और कितने घंटे हंगामा कर रहे हैं। महत्वपूर्ण विधेयक, जिनमें FCRA संशोधन जैसे मुद्दे भी शामिल हैं, उन पर विस्तृत चर्चा की जरूरत है। देश की अर्थव्यवस्था, युवाओं, रोजगार, शिक्षा, किसानों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवालों पर सांसदों को अपनी बात रखने की जरूरत है। लेकिन यदि हर मुद्दे का समाधान सदन की कार्यवाही रोककर खोजा जाएगा तो संसद का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
विपक्ष का सरकार से सवाल करना लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन सवाल पूछने के लिए संसद को ही बंद कर देना लोकतंत्र की ताकत नहीं हो सकता। सरकार गलत है तो उसे सदन में घेरिए, उसके जवाब की धज्जियां उड़ाइए, दस्तावेज रखिए, तथ्य रखिए और देश को बताइए कि सरकार कहां गलत है। अमित शाह का जवाब संतोषजनक नहीं है तो जनता के सामने बताइए कि जवाब क्यों गलत है। प्रधानमंत्री से माफी चाहिए तो सदन में मांग रखिए। जंतर-मंतर की कार्रवाई गलत है तो जांच की मांग कीजिए। लेकिन संसद को ही बाधित करके जवाब मांगना लोकतांत्रिक तर्क से कितना उचित है, यह सवाल अब देश पूछ रहा है।
कल आखिरी दिन_अब संसद चलेगी या फिर हंगामे में खत्म होगा सत्र?
मानसून सत्र का कल आखिरी दिन है। अब देश की निगाह इस बात पर है कि आखिरी दिन भी संसद हंगामे और स्थगन की भेंट चढ़ती है या सांसद जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुए सदन को चलने देंगे। क्योंकि संसद में बैठने वाला प्रत्येक सांसद सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का, वह जनता के वोट से वहां पहुंचा है और जनता के पैसे से चलने वाली व्यवस्था का हिस्सा है।
लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही जरूरी है, लेकिन विपक्ष भी जवाबदेही से बाहर नहीं हो सकता। सरकार से जनता पूछेगी कि उसने विपक्ष के सवालों का जवाब क्यों नहीं दिया, लेकिन विपक्ष से भी जनता पूछेगी कि जब जवाब लेने का अवसर मिला तो संसद चलने क्यों नहीं दी?
आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या संसद में बहस चाहिए या सिर्फ राजनीतिक टकराव? क्या जनता को जवाब चाहिए या संसद का स्थगन? क्योंकि 116 करोड़ रुपये किसी पार्टी के खाते से नहीं गए हैं। यह देश की जनता की कमाई है। संसद में एक-एक मिनट जनता के भरोसे और टैक्स के पैसे से चलता है। उस समय को हंगामे में गंवाना केवल आर्थिक नुकसान नहीं, लोकतांत्रिक जिम्मेदारी से भी खिलवाड़ है।
सवाल सरकार से भी है और विपक्ष से भी_जनता के 116 करोड़ रुपये का हिसाब कौन देगा? संसद को चलाने के लिए जनता ने सांसद चुने हैं ना कि संसद रोकने के लिए नहीं। देश की जागृत जनता इसका हिसाब जरूर चाहेगी।
