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एथेनॉल नीति: क्या स्वदेशी के नाम पर जनता पर थोपी जा रही नई आर्थिक कीमत ? -बृजराज सिंह

नई दिल्ली/भोपाल 3 जुलाई 2026। देशभर के पेट्रोल पंपों पर एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की आपूर्ति लगातार बढ़ाई जा रही है। केंद्र सरकार इसे विदेशी कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने, किसानों की आय बढ़ाने और प्रदूषण घटाने की दिशा में बड़ा कदम बताती है। लेकिन अब इस नीति को लेकर कई गंभीर सवाल भी उठने लगे हैं कि स्वदेशी के नाम पर पर्दे के पीछे की सच्चाई कुछ और तो नहीं !

आलोचकों का कहना है कि जब एथेनॉल पेट्रोल की तुलना में सस्ता ईंधन है, तब आम उपभोक्ता को इसका लाभ पेट्रोल की कीमतों में स्पष्ट रूप से क्यों नहीं दिखाई देता? यदि ईंधन में सस्ते एथेनॉल का अनुपात बढ़ रहा है, तो क्या उपभोक्ताओं को उसी अनुपात में कीमतों में राहत नहीं मिलनी चाहिए?

दूसरा बड़ा सवाल वाहनों की तकनीकी अनुकूलता को लेकर है। वर्तमान में देश की अधिकांश गाड़ियां सीमित एथेनॉल मिश्रण (जैसे E20) तक के लिए डिजाइन की गई हैं। वहीं सरकार भविष्य में अधिक एथेनॉल आधारित ईंधन और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि आने वाले वर्षों में करोड़ों वाहन मालिकों पर नई तकनीक वाले वाहन खरीदने का आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।

सरकार का दावा है कि यह पूरी प्रक्रिया ऊर्जा आत्मनिर्भरता और किसानों के हित में है। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि यदि नई ईंधन नीति के कारण आम नागरिकों को अपने मौजूदा वाहन समय से पहले बदलने पड़ें, तो इसका सबसे बड़ा आर्थिक बोझ मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग पर पड़ेगा।

विपक्षी दलों और नीति के आलोचक यह भी मांग कर रहे हैं कि सरकार स्पष्ट करे कि एथेनॉल मिश्रण से वास्तविक लागत में कितनी कमी आती है और उसका लाभ उपभोक्ताओं तक क्यों नहीं पहुंच रहा। साथ ही यह भी बताया जाए कि भविष्य की ईंधन नीति के कारण वर्तमान वाहनों पर क्या प्रभाव पड़ेगा और आम नागरिकों के हितों की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था की गई है। यह सवाल भी उठ रहे है_ स्वदेशी के नाम पर खड़ी हो रही यह पूरी व्यवस्था कहीं इन बड़े उत्पादों में बड़ी-बड़ी शख्सियतों की सहभागिता के लिए तो नहीं खड़ी हो रही?

एथेनॉल नीति के समर्थक इसे भारत की ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताते हैं, जबकि आलोचक इसे ऐसी नीति मानते हैं जिसका आर्थिक बोझ अंततः आम उपभोक्ता को उठाना पड़ सकता है। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह पारदर्शी आंकड़ों और स्पष्ट नीति के माध्यम से जनता की आशंकाओं का समाधान करे।

किसी भी सार्वजनिक नीति का अंतिम उद्देश्य जनता का हित होना चाहिए। यदि नई नीति से वास्तव में पर्यावरण, किसानों और देश को लाभ होता है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन यदि आम नागरिक पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है, तो सरकार की जिम्मेदारी है कि वह उसका पारदर्शी उत्तर दे और उपभोक्ताओं को उचित राहत भी सुनिश्चित करे।