अब 35 अतिरिक्त कार्यपालन यंत्रियों का क्या होगा?
भोपाल। मप्र लोक निर्माण विभाग (PWD) में वर्षों से लंबित पदोन्नतियों का सिलसिला शुरू तो हो गया है, लेकिन इसके साथ ही एक ऐसा प्रशासनिक गणित सामने आया है जिसने पूरे विभाग में नई बहस छेड़ दी है।
विभाग में कार्यपालन यंत्री (Executive Engineer) के कुल स्वीकृत पद 204 हैं। हाल ही में 174 सहायक यंत्रियों को कार्यपालन यंत्री पद पर पदोन्नति दी गई है, जबकि 65 अधिकारियों के परिणाम सीलबंद लिफाफों (Sealed Cover) में रखे गए हैं। यदि भविष्य में इन सभी 65 अधिकारियों के लिफाफे खुलते हैं और वे भी पदोन्नत होते हैं, तो कुल संख्या 239 हो जाएगी। यानी स्वीकृत पदों से 35 अधिक कार्यपालन यंत्री हो जाएंगे। यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—जब स्वीकृत पद ही 204 हैं, तब 239 कार्यपालन यंत्रियों का समायोजन आखिर कैसे होगा?
क्या हमेशा बंद रहेंगे कुछ लिफाफे या होगा लंबा इंतजार?
विभागीय गलियारों में चर्चा है कि यदि सभी सीलबंद लिफाफे खोल दिए गए तो स्वीकृत पदों से अधिक पदोन्नत अधिकारी हो जाएंगे। ऐसे में क्या कुछ लिफाफे वर्षों तक बंद ही रखे जाएंगे? या फिर उन्हें धीरे-धीरे, लंबी प्रतीक्षा और प्रशासनिक कवायद के बाद खोला जाएगा? यह प्रश्न अब विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
हैरानी की बात यह भी है कि जिन अधिकारियों को पदोन्नति मिल चुकी है, उन्हें अब तक नए पदों पर पदस्थापना के आदेश जारी नहीं हुए हैं। माना जा रहा है कि विभाग पहले पूरी पदोन्नति प्रक्रिया और संभावित नई सूचियों का आकलन कर रहा है। चर्चा यह भी है कि उपयंत्रियों की पदोन्नति सूची भी आज जारी हो सकती है, जिसके बाद एक साथ व्यापक पदस्थापना की जा सकती है।
सुशासन की मंशा पर कहीं भारी न पड़ जाए विभागीय खेल
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने लंबे समय से अटकी पदोन्नतियों को आगे बढ़ाकर कर्मचारियों और अधिकारियों को राहत देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। लेकिन यदि इस प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी, विसंगतियां या मनमानी सामने आती हैं, तो यह सरकार की सुशासन की मंशा को रौंदना माना जा सकता है।
विभागीय सूत्रों का कहना है कि यदि किसी स्तर पर पदोन्नति प्रक्रिया का उपयोग निजी हितों, दबाव या कथित सिंडिकेट के प्रभाव में किया गया, तो ऐसे मामलों की जवाबदेही तय होना स्वाभाविक होगा। नियमों के विपरीत किसी भी प्रकार की कार्रवाई अंततः जांच के दायरे में आ सकती है।
प्रभार की राजनीति भी बनी चिंता का विषय
विभाग में यह चर्चा भी तेज है कि पिछले एक-दो वर्षों में विभिन्न पदों पर प्रभार (Charge) देने के नाम पर जो व्यवस्थाएं बनाई गई थीं, उन्हें प्रभावित होने से बचाने की कोशिशें भी हो सकती हैं। यदि ऐसा हुआ तो पदस्थापना प्रक्रिया एक बार फिर विवादों के घेरे में आ सकती है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि विभाग नियमों और पारदर्शिता के आधार पर आगे बढ़ता है या फिर पदोन्नति के बाद पदस्थापना और समायोजन के नाम पर नया विवाद जन्म लेता है। सबसे बड़ा प्रश्न फिलहाल यही है—जब स्वीकृत पद 204 हैं, तो 239 कार्यपालन यंत्रियों का भविष्य आखिर तय कैसे होगा?
