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MPBDC में 126 नियुक्तियां विवादों के घेरे में, क्या नियमों से पहले बांट दी गई थीं नौकरियां ?

भोपाल। युग क्रांति की सुर्ख़ियोंम रही लोक निर्माण विभाग की कार्यकारी एजेंसियां एमपीबीडीसी और एमपीआरडीसी से जुड़ा एक ताजा मामला सामने आया है, जिसमें म.प्र.भवन विकास निगम (MPBDC) में वर्ष 2022 के दौरान की गई 126 नियुक्तियों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, निगम के सेवा नियम लागू होने और संचालक मंडल द्वारा भर्ती प्रक्रिया को विधिवत अनुमोदन मिलने से पहले ही कार्यकारी एजेंसी एमपीआरडीसी (MPRDC) के माध्यम से विभिन्न पदों पर नियुक्तियां कर दी गईं। अब इन नियुक्तियों की वैधता, वित्तीय भुगतान और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका को लेकर हाल ही में उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज हो गई है।

दस्तावेजों के मुताबिक, MPBDC का संचालक मंडल 19 अक्टूबर 2022 को पहली बार अस्तित्व में आया, जबकि सेवा नियम 10 नवंबर 2022 से प्रभावी हुए। इसके बावजूद 7 जनवरी 2022 को जारी विज्ञापन के आधार पर महाप्रबंधक से लेकर लेखापाल तक कुल 126 पदों पर संविदा और नियमित नियुक्तियां किए जाने का उल्लेख है। साथ ही म प्र शासन के लोक निर्माण विभाग मंत्रालय भोपाल के आदेश दिनांक 18 नवंबर 2022 को जारी पत्र क्रमांक एफ 24-1/2021/सा./19 अनुसार म.प्र. भवन विकास निगम हेतु पूर्व में स्वीकृत कुल 198 पदों के अतिरक्त 13 अन्य नवीन पदों का सृजन करते हुए कुल 211 पदों की स्वीकृति प्रदान की गई।

‘लीगल वैक्यूम’ में हुई नियुक्तियों का आरोप

उपलब्ध अभिलेखों में यह प्रश्न उठाया गया है कि जब तक सेवा नियम लागू नहीं हुए थे और भर्ती प्रक्रिया को संचालक मंडल की विधिवत मंजूरी प्राप्त नहीं थी, तब उस अवधि में की गई नियुक्तियों का कानूनी आधार क्या था? विशेषज्ञों के अनुसार यदि सक्षम प्राधिकार की स्वीकृति के बिना नियुक्तियां हुई हैं तो मामला अधिकार क्षेत्र के अतिक्रमण (Excess of Jurisdiction) और प्रशासनिक अनियमितता के दायरे में आ सकता है।

मामले में विवादित नियुक्तियों को निरस्त करने, अब तक दिए गए वेतन एवं वित्तीय लाभों की वसूली करने तथा पूरी प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग भी उठाई गई है। साथ ही स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच कराए जाने की आवश्यकता जताई गई है और आवश्यकता पड़ने पर इस मसले की न्यायपालिका तक पहुंचने की भी संभावना बताई जा रही है।

यदि दस्तावेजों में उठाए गए सवाल सही साबित होते हैं, तो यह मामला केवल भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी धन, प्रशासनिक जवाबदेही और अधिकारों के दुरुपयोग जैसे गंभीर मुद्दों को भी कटघरे में खड़ा करेगा। ऐसे में अब निगाहें राज्य शासन और MPBDC प्रबंधन के रुख पर टिकी हैं।