प्रमुख सचिव को लिखे सवालिया पत्र में कहा_ प्रतिनियुक्त अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार देने का अधिकार प्रमुख अभियंता को नहीं; कनिष्ठ अधिकारी को वरिष्ठ का प्रभार सौंपने पर भी आपत्ति
भोपाल। लोक निर्माण विभाग (PWD) में मुख्य अभियंताओं और अतिरिक्त प्रभारों को लेकर पिछले कई महीनों से चल रहा विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। विभाग के प्रभारी मुख्य अभियंता (राष्ट्रीय राजमार्ग परिक्षेत्र) संजय मस्के ने प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर प्रमुख अभियंता द्वारा जारी एक आदेश की वैधता पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इस पत्र ने विभाग में प्रभारों के वितरण, अधिकार क्षेत्र और प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।
दरअसल, प्रमुख अभियंता द्वारा 1 जुलाई 2026 को जारी आदेश में बी.पी. बोरासी को राष्ट्रीय राजमार्ग परिक्षेत्र भोपाल का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। लेकिन संजय मस्के का कहना है कि श्री बोरासी वर्तमान में प्रतिनियुक्ति पर मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम (MPRDC) में पदस्थ हैं तथा वहां पहले से ही अतिरिक्त दायित्व निभा रहे हैं। ऐसे में प्रतिनियुक्त अधिकारी को मूल विभाग में एक और अतिरिक्त प्रभार देने का अधिकार प्रमुख अभियंता के पास नहीं है।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि शासन के आदेशों के अनुसार प्रतिनियुक्त अधिकारी को मूल विभाग में अतिरिक्त दायित्व सौंपने का अधिकार शासन को है, न कि प्रमुख अभियंता को। इतना ही नहीं, मस्के ने वरिष्ठता सूची का हवाला देते हुए यह भी कहा है कि बी.पी. बोरासी उनसे कनिष्ठ अधिकारी हैं, इसलिए कनिष्ठ अधिकारी को वरिष्ठ अधिकारी का प्रभार सौंपना भी स्थापित प्रशासनिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं माना जा सकता। उन्होंने प्रमुख सचिव से आदेश की वैधता पर मार्गदर्शन तथा आवश्यक कार्रवाई की मांग की है।
पहले से विवादों में रहा है प्रभारों का खेल
लोक निर्माण विभाग में अतिरिक्त प्रभारों को लेकर पिछले कुछ महीनों से लगातार विरोधाभासी आदेश चर्चा का विषय रहे हैं। विभागीय हलकों में यह सवाल बार-बार उठता रहा है कि कभी किसी अधिकारी को एक साथ कई उच्च पदों का अतिरिक्त प्रभार दे दिया जाता है, जबकि कई वरिष्ठ अधिकारी बिना किसी अतिरिक्त दायित्व के बैठे रहते हैं। सूत्रों के अनुसार, पदोन्नति प्रक्रिया लंबे समय से रुकी होने के कारण अतिरिक्त प्रभारों को लेकर विभाग के भीतर असंतोष लगातार बढ़ा है।
विभाग से जुड़े जानकार यह भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या प्रमुख अभियंता को MPRDC जैसे उपक्रम में प्रतिनियुक्त अधिकारी को, शासन अथवा निगम प्रबंधन की स्वीकृति के बिना, अपने आदेश से वापस लोक निर्माण विभाग की जिम्मेदारी सौंपने का अधिकार है? यही प्रश्न अब संजय मस्के के पत्र के माध्यम से औपचारिक रूप से प्रमुख सचिव के समक्ष भी पहुंच गया है।
हाईकोर्ट तक पहुंच चुके हैं कई प्रकरण
सूत्रों का कहना है कि अतिरिक्त प्रभारों से जुड़े कई मामले पहले से ही न्यायालय में विचाराधीन हैं। विभाग के भीतर यह भी चर्चा है कि बार-बार विवादित आदेश जारी होने से प्रशासनिक निर्णयों की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में मस्के का यह पत्र भविष्य में विभागीय प्रभार व्यवस्था की वैधानिकता तय करने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित हो सकता है।
उठ रहे हैं यह बड़े सवाल..
- क्या प्रमुख अभियंता ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश जारी किया?
- क्या प्रतिनियुक्त अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार देने के लिए शासन की स्वीकृति आवश्यक थी?
- क्या वरिष्ठता की अनदेखी कर कनिष्ठ अधिकारी को वरिष्ठ का प्रभार सौंपा गया?
- यदि आदेश नियमों के विपरीत है, तो क्या इसे निरस्त किया जाएगा?
लोक निर्माण विभाग में अतिरिक्त प्रभारों को लेकर पहले से चल रही खींचतान के बीच अब एक प्रभारी मुख्य अभियंता द्वारा प्रमुख अभियंता के आदेश को ही चुनौती दिए जाने से यह मामला महज प्रशासनिक आदेश का नहीं, बल्कि विभागीय कार्यप्रणाली, अधिकारों की सीमा और पारदर्शिता की परीक्षा बन गया है। अब सबकी निगाहें प्रमुख सचिव के निर्णय पर टिकी हैं।
