सामान्य वर्ग के पदों पर आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों की कथित गलत पदोन्नति का खामियाजा पात्र शिक्षकों को भुगतना पड़ा, अब रिव्यू डीपीसी से न्याय की मांग
भोपाल। मध्य प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग में शिक्षकों की व्याख्याता पद पर पदोन्नति का मामला एक बार फिर सवालों के घेरे में है। पदोन्नति प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और रोस्टर के पालन में गड़बड़ी के आरोप लगाते हुए प्रभावित शिक्षकों की ओर से “शिक्षक- व्याख्याता एवं प्राचार्य सवर्ग मप्र” के प्रांतीय उपाध्यक्ष शिवबीर सिंह भदोरिया ने मुख्यमंत्री, स्कूल शिक्षा मंत्री, मुख्य सचिव, स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव और लोक शिक्षण संचालनालय के आयुक्त से हस्तक्षेप की मांग की है।
शिक्षकों का आरोप है कि अधिकारियों की कथित लापरवाही से वरिष्ठ पात्र कर्मचारी पदोन्नति से वंचित रह गए और उन्हें न्याय देने के बजाय 3 अक्टूबर 2015 को आयोजित डीपीसी की कार्यवाही ही निरस्त कर दी गई। अब मांग उठ रही है कि निरस्त डीपीसी की समीक्षा कर पात्र शिक्षकों को उनकी वास्तविक वरिष्ठता और पात्रता के अनुसार पदोन्नति का लाभ दिया जाए।
2008 से 2014 तक के पदोन्नति आदेशों पर उठे सवाल
शिक्षकों की ओर से शासन को भेजे गए ज्ञापन में कहा गया है कि सामान्य प्रशासन विभाग के निर्देशों के अनुसार रिक्त पदों पर प्रतिवर्ष और वर्ष 2013 से प्रत्येक छह माह में पदोन्नति प्रक्रिया पूरी की जानी थी, लेकिन स्कूल शिक्षा विभाग में शिक्षक एवं प्रधान अध्यापक से व्याख्याता पद पर पदोन्नति की प्रक्रिया लंबे समय तक लंबित रही। ज्ञापन के अनुसार, लोक शिक्षण संचालनालय के पत्र क्रमांक 993, दिनांक 12 सितंबर 2014 के क्रम में जिलों से प्रस्ताव मंगाए गए थे।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2008 में जारी पदोन्नति आदेश में बड़ी संख्या में वरिष्ठ कर्मचारियों को छोड़कर कनिष्ठ कर्मचारियों को पदोन्नत किया गया। इसके बाद 1 अगस्त 2009, 18 जनवरी 2012 और 12 दिसंबर 2014 को जारी पुनरीक्षित पदोन्नति आदेशों में भी रोस्टर के पालन को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
ज्ञापन में दावा किया गया है कि राजनीति शास्त्र के 82 पदों और अर्थशास्त्र के चार पदों के संबंध में अनुसूचित जाति वर्ग के कर्मचारियों को सामान्य वर्ग के पदों पर पदोन्नति दिए जाने की गड़बड़ी हुई। इस संबंध में ज्ञापन के अलग-अलग बिंदुओं में आंकड़ों का उल्लेख किया गया है, जिनका विभागीय अभिलेखों से सत्यापन आवश्यक है।
जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई के बजाय डीपीसी निरस्त करने का आरोप
शिक्षकों का सबसे गंभीर आरोप यह है कि पूर्व की पदोन्नति प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और वास्तविक पात्र कर्मचारियों को उनका अधिकार देने के बजाय 3 अक्टूबर 2015 को आयोजित बहुप्रतीक्षित डीपीसी की कार्यवाही निरस्त कर दी गई।
ज्ञापन के अनुसार, शिक्षक से व्याख्याता पद पर पदोन्नति के लिए 26 जून 2008 को आयोजित डीपीसी के बाद भी प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप सामने आए थे। इसके बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। शिक्षकों का कहना है कि यदि पूर्व के आदेशों में रोस्टर अथवा वरिष्ठता संबंधी त्रुटियां थीं, तो उनकी निष्पक्ष समीक्षा की जानी चाहिए थी। कथित गलत पदोन्नतियों की जिम्मेदारी तय करने के बजाय पूरी प्रक्रिया निरस्त होने से उन कर्मचारियों को नुकसान हुआ, जो पदोन्नति के लिए पात्रता रखते थे।
अब प्रभावित शिक्षकों की मांग है कि विभाग पुराने अभिलेखों, वरिष्ठता सूची, रिक्त पदों और रोस्टर की जांच कराए तथा नियमानुसार रिव्यू डीपीसी आयोजित करे, ताकि किसी भी पात्र कर्मचारी के साथ अन्याय न हो।
पदोन्नति से वंचित शिक्षकों में नाराजगी, सरकार से न्याय की उम्मीद
ज्ञापन में भदोरिया ने कहा है कि पदोन्नति केवल पद और वेतन में वृद्धि का विषय नहीं, बल्कि कर्मचारी की वर्षों की सेवा, कार्यक्षमता, योग्यता और समर्पण का सम्मान भी है। निर्धारित सेवा अभिलेख और पात्रता पूरी करने के बावजूद वर्षों तक पदोन्नति नहीं मिलने से कर्मचारियों के मनोबल और सामाजिक प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
शिक्षकों ने यह भी सवाल उठाया है कि जब वरिष्ठ अधिकारियों की पदोन्नति समय पर हो सकती है, तो पात्र शिक्षकों को वर्षों तक उनके अधिकार से वंचित क्यों रखा जाए? उनका कहना है कि शिक्षा विभाग में कार्यरत शिक्षक विद्यार्थियों के भविष्य निर्माण की जिम्मेदारी निभाते हैं। ऐसे में उनके साथ पदोन्नति के मामले में लंबे समय तक अनिश्चितता बनी रहना विभागीय कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
शासन से प्रमुख मांगें: 3 अक्टूबर 2015 की निरस्त डीपीसी की रिव्यू डीपीसी कराई जाए, पात्र शिक्षकों को नियमानुसार पदोन्नति का लाभ दिया जाए, पूर्व के पदोन्नति आदेशों में रोस्टर एवं वरिष्ठता संबंधी कथित गड़बड़ियों की जांच हो तथा लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। ज्ञापन में पात्र शिक्षकों को नियमानुसार पूर्व प्रभाव से पदोन्नति देने की भी मांग की गई है।
अब देखना होगा कि मुख्यमंत्री और स्कूल शिक्षा मंत्री इस लंबे समय से लंबित मामले में हस्तक्षेप कर प्रभावित शिक्षकों को राहत दिलाते हैं या पदोन्नति का यह विवाद विभागीय फाइलों में ही उलझा रहता है।
