12.67 लाख बस्तियों को मिली डिजिटल पहचान, लेकिन 4.28 लाख बस्तियों का रिकॉर्ड अभी बाकी
नई दिल्ली 13 अगस्त 2026। ग्रामीण भारत के हर घर तक नल से पानी पहुंचाने के दावे के बीच जल जीवन मिशन के डिजिटल निगरानी तंत्र को लेकर केंद्र सरकार ने नया आंकड़ा सामने रखा है। सरकार के अनुसार देश की कुल 16,96,213 ग्रामीण बस्तियों में से 12,67,808 यानी 75 प्रतिशत बस्तियों को ‘सुजल गांव आईडी’ जारी की जा चुकी है। यानी करीब 4.28 लाख ग्रामीण बस्तियां अभी इस डिजिटल पहचान से बाहर हैं।
केंद्र सरकार का दावा है कि ‘सुजल गांव आईडी’ केवल एक नंबर नहीं, बल्कि ग्रामीण पेयजल व्यवस्था की पहचान, निगरानी, रिपोर्टिंग, ट्रैकिंग और सत्यापन का महत्वपूर्ण डिजिटल माध्यम है। जल जीवन मिशन 2.0 के तहत इसे राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि किसी ग्रामीण क्षेत्र में पानी की आपूर्ति व्यवस्था किस स्थिति में है और उससे संबंधित परिसंपत्तियां कहां मौजूद हैं।
‘सुजलम भारत’ से स्रोत से नल तक हर व्यवस्था पर डिजिटल नजर
जल जीवन मिशन के तहत विकसित ‘सुजलम भारत’ को ग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं के जीवनचक्र आधारित और सेवा-केंद्रित प्रबंधन के लिए डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के रूप में विकसित किया गया है। इसमें डिजिटल एसेट रजिस्टर, जीआईएस मैपिंग और निर्णय-सहायता प्रणाली को एक साथ जोड़ा गया है।
‘सुजल गांव आईडी’ जहां जलापूर्ति के सेवा क्षेत्र की डिजिटल पहचान करती है, वहीं ‘सुजलम भारत आईडी’ ग्रामीण जलापूर्ति योजना को विशिष्ट पहचान देती है। जीआईएस और हाइड्रोलिक लिंक के माध्यम से सरकार का लक्ष्य पानी के स्रोत से लेकर ग्रामीण घरों में लगे नल तक पूरी व्यवस्था का डिजिटल मानचित्र तैयार करना है।
इससे सरकार को यह पहचानने में मदद मिल सकती है कि कहां नई योजना की जरूरत है, कहां पुरानी योजनाओं में कमी है, कहां संसाधनों का दोहराव हो रहा है और किन जलापूर्ति परिसंपत्तियों के संचालन एवं रखरखाव पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।
75 प्रतिशत की उपलब्धि के बीच 25 प्रतिशत का सवाल
सरकार डिजिटल निगरानी को पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने का बड़ा हथियार बता रही है, लेकिन 75 प्रतिशत कवरेज के साथ अभी 25 प्रतिशत ग्रामीण बस्तियों का इस व्यवस्था से बाहर होना भी कम महत्वपूर्ण सवाल नहीं है। 10 अगस्त 2026 तक 4,28,405 ग्रामीण बस्तियों को ‘सुजल गांव आईडी’ जारी नहीं हुई थी।
डिजिटल पहचान बनना अपने आप में ग्रामीणों को पानी उपलब्ध होने की गारंटी नहीं है। असली परीक्षा यह होगी कि जिन बस्तियों को आईडी मिल चुकी है, वहां नल में नियमित पानी पहुंच रहा है या नहीं, पानी की गुणवत्ता कैसी है, योजनाएं कितनी देर तक चालू रहती हैं और खराब होने वाली जलापूर्ति व्यवस्थाओं का समय पर रखरखाव होता है या नहीं।
यही वजह है कि ‘सुजल गांव आईडी’ और ‘सुजलम भारत आईडी’ को सरकार ने निगरानी और जवाबदेही का माध्यम बताया है। जीआईएस आधारित निगरानी से योजनाओं की वास्तविक स्थिति सामने आने और अनियमितताओं को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
केंद्रीय जल शक्ति राज्य मंत्री वी. सोमन्ना ने यह जानकारी गुरुवार को लोकसभा में एक लिखित उत्तर में दी। अब चुनौती केवल ग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं को डिजिटल पहचान देने की नहीं, बल्कि इस डिजिटल व्यवस्था को जमीन पर हर नल, हर गांव और हर ग्रामीण परिवार तक पहुंचने वाली वास्तविक जल सेवा से जोड़ने की है।
