ठेकेदारी व्यवस्था में बड़ा सुधार, खुले टेंडर और ‘जीरो कमीशन’ नीति से सरकारी खजाने को करोड़ों की बचत; पूरे देश में छिड़ी सुशासन की बहस
चेन्नई/भोपाल। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलपति विजय ने सरकारी ठेकेदारी व्यवस्था में कथित 30 से 40 प्रतिशत कमीशनखोरी पर सख्त विराम लगाने के निर्देश देकर देशभर में सुशासन और पारदर्शिता की नई बहस छेड़ दी है। सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया है कि अब सरकारी ठेके न तो बंद कमरों में तय होंगे और न ही कथित कमीशन के आधार पर, बल्कि पूरी तरह प्रतिस्पर्धी और पारदर्शी निविदा प्रक्रिया से दिए जाएंगे। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, इस व्यवस्था के बाद कई सार्वजनिक निर्माण कार्यों में ठेके अनुमानित लागत से 25 से 30 प्रतिशत कम दरों पर मिलने लगे हैं, जिससे सरकारी खजाने को उल्लेखनीय बचत हो रही है।
बताया जा रहा है कि पहले जिस व्यवस्था में कथित रूप से 30-40 प्रतिशत तक कमीशन जोड़ा जाता था, उसी कारण परियोजनाओं की लागत बढ़ जाती थी। नई सरकार ने इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने और प्रत्येक ठेके में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। सरकार के मंत्रियों ने भी सार्वजनिक रूप से कहा है कि अब ठेके हासिल करने के लिए किसी प्रकार की रिश्वत या कमीशन की आवश्यकता नहीं होगी।
मध्य प्रदेश के लिए बड़ा सवाल
यह फैसला केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश सहित पूरे देश के लिए एक गंभीर संदेश है। हालांकि मध्य प्रदेश भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के मामले में देश में अव्वल दर्जे का ऐसा राज्य बन चुका है जहां मुख्यमंत्री पर भी आरोप लग रहे हैं। यदि पारदर्शी निविदा प्रणाली से एक राज्य करोड़ों रुपये बचा सकता है, तो उन राज्यों में भी ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं अपनाई जा सकती जहाँ वर्षों से ठेकेदारी, कमीशनखोरी और लागत बढ़ने के आरोप लगते रहे हैं?
मध्य प्रदेश में समय-समय पर सार्वजनिक निर्माण, सिंचाई, भवन, सड़क और अन्य परियोजनाओं में लागत वृद्धि, वेरिएशन और ठेकेदारी व्यवस्था को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में तमिलनाडु का मॉडल यह संकेत देता है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो सरकारी धन की बड़ी बचत की जा सकती है और भ्रष्टाचार की संभावनाओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
आमजन की राय, युग क्रांति का मत
युग क्रांति का मानना है कि जनता का टैक्स जनता के विकास पर खर्च होना चाहिए, न कि कथित कमीशनखोरी की व्यवस्था में समाप्त होना चाहिए। यदि तमिलनाडु सरकार वास्तव में ‘जीरो कमीशन’ और पारदर्शी ठेकेदारी व्यवस्था को सफल बनाती है, तो यह केवल एक राज्य की उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि पूरे देश के लिए सुशासन का एक अनुकरणीय मॉडल बन सकती है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्य भी ऐसी पारदर्शी व्यवस्था लागू करने का साहस दिखाएंगे, या फिर पुरानी ठेकेदारी संस्कृति ही जारी रहेगी?
