बरघाट के आठ आरक्षक आवास गिरने की जांच रिपोर्ट तीन साल से गायब, दोषी ठहराए गए अधिकारी पर कार्रवाई नहीं; उल्टा समयमान वेतनमान और अब नियमित पदोन्नति की तैयारी..
भोपाल। मप्र पुलिस आवास एवं अधोसंरचना विकास निगम (पुलिस हाउसिंग कॉरपोरेशन) में इन दिनों सबसे बड़ी चर्चा किसी नए निर्माण की नहीं, बल्कि एक ऐसी जांच रिपोर्ट की है, जिसे कथित तौर पर दबा दिया गया ताकि दोषी अधिकारी पर कार्रवाई न हो सके।
विडंबना यह है कि वर्ष 2017 में एक कांस्टेबल आवास की रसोई की छत से प्लास्टर का छोटा-सा टुकड़ा गिरने पर
तत्कालीन उपयंत्री/ सहा. यंत्री आलोक निगम को निलंबित कर दिया गया था, लेकिन इसी की प्रमुख जिम्मेदारी में बरघाट (जिला सिवनी) में आठ आरक्षक आवासों के पूरी तरह धराशायी होने की जांच रिपोर्ट तीन वर्ष पहले मुख्यालय पहुंचने के बावजूद आज तक कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हुई। इसके विपरीत उन्हें समयमान वेतनमान का लाभ मिल चुका है और अब नियमित पदोन्नति देकर अधीक्षण यंत्री बनाए जाने की चर्चाएं निगम मुख्यालय में जोरों पर हैं।
जांच रिपोर्ट ने क्या कहा था?
युग क्रांति के पास उपलब्ध 2 अगस्त 2023 की आधिकारिक जांच रिपोर्ट में अधीक्षण यंत्री एवं जांच अधिकारी किशन वीधानी ने स्पष्ट रूप से पाया कि—
*स्वीकृत स्ट्रक्चरल ड्राइंग में बदलाव किया गया।
*बालकनी का डिजाइन बिना अनुमोदित स्ट्रक्चरल डिजाइन के बदल दिया गया।
*मानक से छोटे आरसीसी बीम बनाए गए, जिससे बीम फेल हुए और भवन धराशायी हो गए।
*सीमेंट, स्टील, ईंट, कंक्रीट, स्लंप टेस्ट सहित अधिकांश अनिवार्य गुणवत्ता परीक्षण नहीं कराए गए।
*निर्माण पूर्व मिट्टी (Soil Investigation) की जांच तक नहीं कराई गई।
*वर्क्स मैनुअल के अनुसार आवश्यक तकनीकी जांच और माप परीक्षण भी नहीं किए गए।
रिपोर्ट में तत्कालीन सहायक यंत्री आलोक निगम और परियोजना यंत्री जे.एन. पाण्डेय की गंभीर पर्यवेक्षणीय लापरवाही दर्ज करते हुए विभागीय जांच की अनुशंसा की गई।
सबसे बड़ा सवाल—रिपोर्ट गई कहां?
अब सबसे बड़ा प्रश्न निर्माण नहीं, बल्कि जांच रिपोर्ट का भविष्य है। पुलिस हाउसिंग कॉरपोरेशन के गलियारों में चर्चा है कि मुख्यालय को भेजी गई इस जांच रिपोर्ट पर न तो विभागीय जांच शुरू हुई, न कोई दंडात्मक कार्रवाई हुई और न ही रिपोर्ट का कोई परिणाम सामने आया। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि—
क्या जांच रिपोर्ट को जानबूझकर दबा दिया गया?
क्या उसे रिकॉर्ड से ही गायब कर दिया गया?
या फिर प्रभावशाली अधिकारियों को बचाने के लिए उसे फाइलों में दफना दिया गया?
इन सवालों का उत्तर आज तक निगम प्रबंधन नहीं दे पाया है।
दो घटनाएं… दो मापदंड?
यही मामला अब पुलिस हाउसिंग की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।
2017 में रसोई की छत से प्लास्टर का एक टुकड़ा गिरा—अधिकारी तत्काल निलंबित।
बरघाट में आठ पूरे सरकारी आवास गिर गए, करोड़ों रुपये का सरकारी नुकसान हुआ, जांच अधिकारी ने जिम्मेदारी तय कर दी—फिर भी तीन वर्ष तक कोई कार्रवाई नहीं।
यदि प्लास्टर गिरना निलंबन का आधार था, तो आठ सरकारी मकानों का धराशायी होना क्या पदोन्नति का आधार बन गया?
युग क्रांति का सवाल
यदि आधिकारिक जांच प्रतिवेदन में दोष तय हो चुका है तो—
क्या इस रिपोर्ट को जानबूझकर दबाया गया?
दोषी अधिकारी को संरक्षण किसके आदेश पर दिया जा रहा है?
क्या विभागीय कार्रवाई से बचाने के लिए रिकॉर्ड ही गायब कर दिया गया?
और क्या अब उसी अधिकारी को पदोन्नति देकर पूरे प्रकरण पर हमेशा के लिए पर्दा डालने की तैयारी है?
जब प्लास्टर का एक टुकड़ा गिरने पर निलंबन हो सकता है, तो आठ सरकारी आवास गिरने के बाद भी यदि जांच रिपोर्ट दबा दी जाए और दोषी अधिकारी को पदोन्नति मिले, तो यह केवल दोहरी नीति नहीं बल्कि सरकारी जवाबदेही पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न है।
कार्रवाई के बजाय इनाम?
सूत्रों के अनुसार, जिस अधिकारी के विरुद्ध जांच प्रतिवेदन में गंभीर टिप्पणियां दर्ज हैं, उसी अधिकारी को पहले समयमान वेतनमान का लाभ दिया जा चुका है और अब उसे अधीक्षण यंत्री पद पर नियमित पदोन्नति देने की तैयारी चल रही है।
यदि यह सही है तो यह केवल एक अधिकारी का मामला नहीं, बल्कि पूरे पुलिस हाउसिंग कॉरपोरेशन की जवाबदेही, पारदर्शिता और अनुशासन व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति से पुलिस हाउसिंग कॉरपोरेशन के एमडी एवं वरिष्ठ आईपीएस अनंत कुमार सिंह से विभाग और आम जनता को कुशल प्रबंधन एवं पारदर्शी व्यवस्था की उम्मीद थी लेकिन क्या वह भी इसी जर्जर सिस्टम का ऐसा बनेंगे अथवा 2017 वाले युग को पुनर्जीवित करेंगे_यह बड़ा सवाल है!
