मंदिरों में सामने आए विवादों ने खड़े किए जवाबदेही के सवाल, अब दान की संस्कृति में पारदर्शिता पर भी हो विचार..
*बृजराज सिंह तोमर। देश में करोड़ों श्रद्धालु ईश्वर के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सेवा-भाव से मंदिरों एवं धार्मिक संस्थानों में प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपये का दान और चढ़ावा अर्पित करते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश के कई बड़े धार्मिक स्थलों से दान, चढ़ावे अथवा वित्तीय प्रबंधन से जुड़े विवादों ने यह गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या श्रद्धालुओं के विश्वास की रक्षा के लिए वर्तमान व्यवस्था पर्याप्त है?
हाल में अयोध्या स्थित राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़े कथित गबन के मामले में एफआईआर दर्ज होने, गिरफ्तारियां होने तथा एसआईटी जांच शुरू होने के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि श्रद्धालुओं के दान की सुरक्षा और पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाए। जांच अभी जारी है और अंतिम निष्कर्ष आना शेष है।
इससे पहले भी तिरुपति मंदिर के प्रबंधन से जुड़े विभिन्न विवाद, केरल के पद्मनाभस्वामी मंदिर की संपत्ति और प्रशासनिक व्यवस्था पर न्यायालय में उठे प्रश्न, सबरीमला मंदिर में स्वर्ण परत और संपत्ति प्रबंधन से जुड़े आरोप तथा अन्य प्रमुख धार्मिक स्थलों में समय-समय पर सामने आए वित्तीय विवाद यह संकेत देते हैं कि आस्था जितनी पवित्र है, उसके प्रबंधन में उतनी ही मजबूत जवाबदेही भी आवश्यक है। हालांकि इन सभी मामलों की प्रकृति अलग-अलग रही है और हर मामले में चोरी या गबन सिद्ध नहीं हुआ है।
दान बंद नहीं, विवेकपूर्ण दान करें
बड़ा सवाल यह नहीं है कि श्रद्धालु दान करें या नहीं, बल्कि यह है कि उनका दान वास्तव में वहीं पहुंच रहा है, जहां पहुंचना चाहिए या नहीं।
यदि कोई श्रद्धालु यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके दान का प्रत्यक्ष सामाजिक लाभ मिले, तो वह प्रमाणित अस्पतालों में गरीब मरीजों के इलाज, निर्धन विद्यार्थियों की शिक्षा, अनाथालयों, वृद्धाश्रमों, गौशालाओं, आपदा राहत, सामुदायिक भोजन, जल संरक्षण अथवा ऐसी धार्मिक संस्थाओं को दान दे सकता है जो नियमित ऑडिट रिपोर्ट और आय-व्यय सार्वजनिक करती हों।
गीता क्या कहती है?
दान के विषय में के अध्याय 17, श्लोक 20 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
“दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥”
अर्थात_जो दान केवल कर्तव्य समझकर, बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा, उचित समय, उचित स्थान और योग्य पात्र को दिया जाता है, वही सात्त्विक दान है।
आस्था भारतीय संस्कृति की आत्मा है, लेकिन आस्था का अर्थ आंखें बंद करना नहीं है। श्रद्धालुओं को दान देने से पहले यह जानने का अधिकार है कि उनके द्वारा अर्पित प्रत्येक रुपये का उपयोग किस उद्देश्य से और किस पारदर्शिता के साथ किया जा रहा है।
यदि देश के धार्मिक संस्थान स्वैच्छिक रूप से वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट, ऑनलाइन आय-व्यय विवरण और स्वतंत्र सामाजिक लेखा परीक्षण सार्वजनिक करना शुरू करें, तो इससे न केवल श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत होगा बल्कि भविष्य में किसी भी प्रकार के विवाद और भ्रष्टाचार की संभावना भी काफी हद तक कम हो सकेगी।
श्रद्धा बनी रहनी चाहिए, लेकिन उसके साथ पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही अनिवार्य होनी चाहिए। आखिर भगवान के नाम पर दिया गया दान, भगवान की सेवा और समाज के कल्याण तक ही पहुंचे—यही हर श्रद्धालु की सबसे बड़ी अपेक्षा है।
