बोर्ड की ऑनलाइन प्रणाली के बावजूद विद्यालयों में अलग-अलग पद्धति से अंक जोड़ने पर सवाल
भोपाल 3 जनवरी 2026। विज्ञान विषय की प्रायोगिक परीक्षा में अंकों की गणना को लेकर एक गंभीर विरोधाभास सामने आ रहा है, जो सीधे-सीधे विद्यार्थियों की प्रवीण्यता सूची, जिला एवं स्थानीय स्तर की रैंकिंग तथा उनके शैक्षणिक भविष्य को प्रभावित कर रहा है।
वर्तमान व्यवस्था के अनुसार_. तिमाही परीक्षा के अंकों का 5% अधिभार (अधिकतम 5 अंक)
छमाही परीक्षा के अंकों का 5% अधिभार (अधिकतम 5 अंक)
प्रायोगिक परीक्षा के कुल अंकों में जोड़ा जाना निर्धारित है। मण्डल द्वारा प्रत्येक छात्र का विषयवार परीक्षाफल ऑनलाइन दर्ज कराया जाता है। इसके बावजूद व्यवहार में एकरूपता नहीं दिखाई दे रही है।
अलग-अलग विद्यालयों में अलग पद्धति
कुछ विद्यालयों द्वारा वार्षिक प्रायोगिक परीक्षा के अंक प्रदान करते समय तिमाही एवं छमाही परीक्षाओं के ऑनलाइन दर्ज अंकों का अधिभार जोड़कर कुल प्रायोगिक अंक दिए जाते हैं। वहीं, कुछ विद्यालय ऐसे भी हैं जो मण्डल की ऑनलाइन प्रणाली में पहले से दर्ज तिमाही/छमाही अंकों को पूरी तरह नजरअंदाज कर केवल वार्षिक प्रायोगिक परीक्षा के आधार पर अंक प्रदान कर रहे हैं।
प्रवीण्यता सूची पर सीधा प्रभाव
यह असमानता तब और गंभीर हो जाती है जब तिमाही/छमाही के अंकों के कारण कोई परीक्षार्थी प्रवीण्यता सूची में स्थान पाने से वंचित रह जाता है या जिला एवं स्थानीय स्तर पर मिलने वाले स्थान में उसका क्रम ऊपर-नीचे हो जाता है। कई मामलों में विद्यार्थी पिछड़ने पर आपत्ति दर्ज कराते हैं, लेकिन स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव में स्थिति बेहद असमंजसपूर्ण बन जाती है।
सवालों के घेरे में प्रणाली
शिक्षाविदों और अभिभावकों का कहना है कि जब तिमाही और छमाही परीक्षाओं के अंक ऑनलाइन दर्ज कराने के लिए विद्यालयों को निर्धारित शुल्क भी चुकाना पड़ता है, तो फिर उन अंकों को वार्षिक प्रायोगिक परीक्षा में नजरअंदाज करना न केवल अनुचित है, बल्कि व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
समाधान की मांग..
जानकारों का मत है कि विद्यालयों द्वारा ऑनलाइन किए गए तिमाही/छमाही अंकों को ही मण्डल द्वारा अंतिम रूप से मान्य कर दर्ज किया जाना चाहिए। इससे सभी विद्यार्थियों के साथ समानता बनी रहेगी, अंकों की गणना में पारदर्शिता आएगी,
बाह्य परीक्षकों को अप्रमाणित या मनमाने ढंग से अंक जोड़ने की बाध्यता से मुक्ति मिलेगी और विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े विवाद स्वतः समाप्त होंगे।
अब आवश्यकता इस बात की है कि मण्डल स्तर पर स्पष्ट, एकरूप और बाध्यकारी दिशा-निर्देश जारी किए जाएँ, ताकि विज्ञान प्रायोगिक परीक्षा में अंकों की गणना को लेकर बना यह विरोधाभास समाप्त हो और विद्यार्थियों के साथ न्याय सुनिश्चित किया जा सके।
