जनजातीय कार्य विभाग के व्याख्याताओं के अधिकारों से खिलवाड़, अफसरशाही पर गंभीर सवाल..
इंदौर। म प्र जनजातीय कार्य विभाग अंतर्गत कार्यरत व्याख्याता संवर्ग को नियत अवधि पूर्ण करने के बाद देय 10, 20, 30 एवं 35 वर्ष के समयमान वेतनमान का लाभ आज तक नहीं मिल पाया है। आरोप है कि स्वीकारकर्ता अधिकारी—विशेषकर संभागीय उपायुक्त—जानबूझकर आदेश लंबित रख रहे हैं, जिससे सैकड़ों लोक सेवक आर्थिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित हो रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, एक ही तिथि पर सेवा अवधि पूर्ण करने वाले व्याख्याताओं के आदेश टुकड़ों-टुकड़ों में जारी किए जा रहे हैं, जिससे अधिकारियों की मंशा पर सवाल खड़े हो रहे हैं। यह स्थिति प्रशासनिक अक्षमता नहीं बल्कि स्वेच्छाचारिता और भेदभावपूर्ण रवैये की ओर इशारा करती है।
1995 बैच के व्याख्याता बने अफसरशाही के शिकार
इंदौर संभाग अंतर्गत वर्ष 1995 में नियुक्त व्याख्याताओं को 12 वर्ष की सेवा पूर्ण करने पर प्रथम क्रमोन्नति का लाभ वर्ष 2007 से दिया गया। इसके बाद राज्य शासन द्वारा 2017 में जारी आदेश के अनुसार व्याख्याता संवर्ग को 01 अप्रैल 2006 से समयमान वेतनमान का लाभ दिया जाना था।
हालांकि, इसी बैच के कुछ व्याख्याताओं को 10 वर्ष के प्रथम समयमान वेतनमान का लाभ दे दिया गया, लेकिन आयुक्त जनजातीय कार्य, भोपाल के अधीन जिन व्याख्याताओं को पहले ही प्रथम क्रमोन्नति मिल चुकी थी, उन्हें आज दिनांक तक प्रथम समयमान वेतनमान का लाभ नहीं दिया गया।
एक संभाग में आदेश, दूसरे में सन्नाटा
चौंकाने वाली बात यह है कि शहडोल संभाग में यह लाभ वर्षों
पहले प्रदान किया जा चुका है, जबकि इंदौर संभाग में आज भी फाइलें धूल खा रही हैं। यही नहीं, 1995 बैच के व्याख्याताओं के तीसरे समयमान वेतनमान के प्रकरणों में भी खुली मनमानी देखने को मिल रही है।
ACR का बहाना, जबकि रिकॉर्ड पहले से जमा
अधिकारियों द्वारा जिन ACR ग्रेडिंग का हवाला देकर प्रकरण लंबित रखे गए, वे सभी ACR पहले ही संचालनालय स्तर पर पदोन्नति प्रक्रिया के दौरान मुख्यालय में जमा कराई जा चुकी हैं। इसके बावजूद भुगतान और आदेश जारी न होना प्रशासन की नीयत पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
व्याख्याता संवर्ग की ओर से मांग की गई है कि जिन अधिकारियों ने शासन के स्पष्ट आदेशों के बावजूद लाभ देने में जानबूझकर विलंब किया है, उनके विरुद्ध कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
संबंधित लोक सेवकों को देय लाभ के आदेश एवं भुगतान प्रक्रिया को समय-सीमा में पूरा कराया जाए।
पूरी प्रक्रिया को निगरानी तंत्र के अधीन रखा जाए, ताकि भविष्य में इस प्रकार की मनमानी न हो।
सवाल यह है…जब शासन के आदेश स्पष्ट हैं, रिकॉर्ड उपलब्ध हैं और अन्य संभागों में लाभ दिया जा चुका है तो फिर इंदौर संभाग में व्याख्याताओं के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों ?
