नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर राष्ट्र नमन
नई दिल्ली/भोपाल 23 जनवरी 2026। भारत की आज़ादी की लड़ाई को निर्णायक मोड़ देने वाले, अदम्य साहस और राष्ट्रभक्ति के प्रतीक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती आज पूरे देश में श्रद्धा, सम्मान और गर्व के साथ मनाई जा रही है। नेताजी केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि वे उस विचारधारा के प्रतीक थे, जिसने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का साहस देश को दिया।
23 जनवरी 1897 को ओडिशा के कटक में जन्मे सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। उन्होंने भारतीय सिविल सेवा (ICS) जैसी प्रतिष्ठित नौकरी को त्यागकर देश की आज़ादी को जीवन का एकमात्र लक्ष्य बनाया। उनका मानना था कि स्वतंत्रता भीख में नहीं, संघर्ष से मिलती है।
आजाद हिंद फौज और स्वाधीन भारत का सपना
नेताजी ने विदेशों में रहकर आजाद हिंद फौज (INA) का गठन किया और “दिल्ली चलो” का नारा देकर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। उनका उद्घोष—
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”
आज भी युवाओं के रगों में देशभक्ति का रक्त दौड़ा देता है।
नेताजी द्वारा गठित आजाद हिंद फौज केवल एक सैन्य संगठन नहीं थी, बल्कि वह युवाओं के आत्मविश्वास और आत्मबल का प्रतीक थी। “दिल्ली चलो” का नारा आज भी यह याद दिलाता है कि जब युवा संगठित होते हैं, तो साम्राज्य भी हिल जाते हैं।
युवा भारत को आज भी पुकारता है ‘दिल्ली चलो’ का आह्वान
जब देश का युवा दिशाहीनता, बेरोज़गारी और वैचारिक भ्रम के दौर से गुजर रहा है, ऐसे समय में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि युवा भारत के लिए चेतना और संकल्प का दिवस बनकर सामने आती है। नेताजी का जीवन आज भी देश के करोड़ों युवाओं को यह सिखाता है कि राष्ट्र निर्माण के लिए साहस, त्याग और स्पष्ट लक्ष्य अनिवार्य है।
नेताजी ने भारतीय सिविल सेवा जैसी सर्वोच्च नौकरी को ठुकराकर यह स्पष्ट कर दिया कि_ राष्ट्र पहले, व्यक्तिगत सुविधा बाद में। आज के युवाओं के लिए यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक है—जब करियर, प्रतिष्ठा और त्वरित सफलता प्राथमिकता बन चुकी है।
नेतृत्व, विचार और त्याग की मिसाल
नेताजी का व्यक्तित्व दृढ़ संकल्प, अनुशासन और राष्ट्र सर्वोपरि की भावना से ओतप्रोत था। वे सामाजिक न्याय, समानता और सशक्त भारत के पक्षधर थे। उन्होंने महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देते हुए रानी लक्ष्मीबाई रेजिमेंट का गठन कर नारी शक्ति को भी राष्ट्रीय संघर्ष का नेतृत्व सौंपा।
आज भी प्रासंगिक हैं नेताजी
आज के भारत में जब राष्ट्रनिर्माण, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय स्वाभिमान की बात होती है, तब नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचार और संघर्ष पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्रहित में लिया गया हर कठोर निर्णय ही सच्ची देशसेवा है।
राष्ट्र का नमन: नेताजी की जयंती पर देश उन्हें कोटि-कोटि नमन करता है और उनके अधूरे सपनों को साकार करने का संकल्प दोहराता है—एक सशक्त, आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी भारत के निर्माण का संकल्प।
