विश्वस्तरीय स्टेशन का सपना, हकीकत में बारिश-सर्दी में बेहाल रेल यात्री
ग्वालियर 27 जनवरी 2026। ग्वालियर रेलवे स्टेशन का तथाकथित पुनर्विकास अब शहर और रेल यात्रियों के लिए विकास नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की यातना बन चुका है। वर्षों से चल रहे इस निर्माण कार्य ने यात्रियों को सुविधाएँ देने के बजाय उनसे न्यूनतम मानवीय अधिकार तक छीन लिए हैं। रेलवे और ठेकेदार द्वारा दिखाए गए विश्वस्तरीय स्टेशन के सपने आज कागज़ों और पोस्टरों तक ही सीमित नजर आ रहे हैं।
रेलवे स्टेशन पर आज की स्थिति यह है कि पेयजल, शौचालय, स्नानागार, प्रतीक्षालय, अमानती सामान गृह और सुरक्षा चौकी जैसी बुनियादी सुविधाएँ या तो नदारद हैं या यात्रियों की पहुँच से बाहर कर दी गई हैं। नतीजा यह कि यात्री खुले आसमान के नीचे सर्दी, बारिश और मौसम की मार झेलने को मजबूर हैं।
गणतंत्र दिवस के ठीक अगले दिन जब युग क्रांति के
संवाददाता ने स्टेशन का जायज़ा लिया तो दृश्य शर्मसार करने वाला था। जिस देश ने एक दिन पहले ही दुनिया को विकास और शक्ति का प्रदर्शन किया, उसी देश के एक ऐतिहासिक और सामरिक महत्व के शहर में रेल यात्री बरसते पानी में ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे। प्लेटफॉर्म पर न तो पर्याप्त शेल्टर था और न ही सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था। यात्री भीगते हुए ट्रेनों में छतरी लेकर चढ़ने-उतरने को विवश थे। यात्रियों की मजबूरी का फायदा उठाने में रेलवे के अधिकारी और कर्मचारी भी पीछे नहीं दिखे। कोई भी जिम्मेदार अधिकारी यात्रियों की दुर्दशा को लेकर गंभीर नजर नहीं आता। यात्रियों को हो रहीं लगातार असुविधा और समस्या के समाधान हेतु वैकल्पिक इंतजाम किए जाने पर जोर दिया मगर प्रशासन आंख मूंदे बैठा है और पुनर्विकास के नाम पर यात्री ठगे जा रहे हैं।
गौरतलब है कि स्टेशन पुनर्विकास का कार्य केपीसी कंपनी द्वारा किया जा रहा है। तय समय सीमा में कार्य पूरा न होने के कारण लगातार एक्सटेंशन लिया जा रहा है। वर्तमान में कार्य की अवधि मार्च 2026 तक बढ़ाई गई है, लेकिन मौजूदा प्रगति को देखते हुए यह साफ है कि यह परियोजना डेढ़ से दो साल से पहले पूरी होती नजर नहीं आ रही। सबसे चिंताजनक बात यह है कि निर्माण कार्य के चलते यात्रियों को हो रही भारी असुविधा को लेकर “युगक्रांति” द्वारा कई बार ग्वालियर एवं मंडल स्तर के इंजीनियरिंग और प्रशासनिक अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया गया। वैकल्पिक इंतजाम, अस्थायी शेल्टर और मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराने की मांग की गई, लेकिन रेलवे अधिकारियों और ठेकेदार की उदासीनता जस की तस बनी हुई है।
अब बड़ा सवाल यह है कि_क्या पुनर्विकास का अर्थ यात्रियों को यातना देना है? कब तक आम रेल यात्री विकास के नाम पर यूँ ही ठगा जाता रहेगा?
ग्वालियर रेलवे स्टेशन का यह हाल न सिर्फ रेलवे प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि विकास के दावों की पोल भी खोलता है। यदि शीघ्र वैकल्पिक सुविधाएँ और मानवीय इंतजाम नहीं किए गए, तो यह पुनर्विकास ग्वालियर के लिए उपलब्धि नहीं, बल्कि एक स्थायी कलंक बन जाएगा।
