महंगी रफ्तार में कुचला जा रहा आम आदमी का सफर
नई दिल्ली, भोपाल, ग्वालियर। भारत सरकार और रेल मंत्रालय देश में आधुनिक रेल सुविधाओं के विस्तार को विकास का प्रतीक मानते हुए लगातार राजधानी, शताब्दी, वंदे भारत और प्रस्तावित बुलेट ट्रेन जैसी हाई-एंड सेवाओं की संख्या बढ़ा रहा है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी छिपी है कि देश की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी आज भी साधारण टिकट के किराये पर ही यात्रा करने को मजबूर है।
भले ही देश की जीडीपी में वृद्धि हो रही हो, लेकिन प्रति व्यक्ति आय की वास्तविक स्थिति यह इजाज़त नहीं देती कि आम नागरिक आधुनिक और महंगी ट्रेनों में सफर कर सके। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या ऊंचे आदर्शों और घोषणाओं से जमीनी हकीकत बदलती है? रेलवे अपनी मूल भूमिका भूल गया है और आधुनिक ट्रेनों की रफ्तार में आम आदमी का सफर छूट गया है?
80 प्रतिशत सुविधा 30 प्रतिशत लोगों के लिए!
रेलवे की मौजूदा व्यवस्था पर नज़र डालें तो तस्वीर और भी असंतुलित दिखाई देती है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रत्येक लंबी दूरी की ट्रेन में 80 प्रतिशत से अधिक बोगियां आरक्षित/प्रीमियम श्रेणी की होती हैं, जबकि 60–70 प्रतिशत जनरल यात्रियों के लिए केवल 15–20 प्रतिशत जनरल बोगियां उपलब्ध कराई जाती हैं।
यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग को अधिक सुविधा और कमजोर वर्ग को सीमित संसाधन दिए जा रहे हैं। जनरल बोगियों में भीड़, अव्यवस्था और असुरक्षा इसी नीति का प्रत्यक्ष परिणाम है।
जनसाधारण एक्सप्रेस: नीति से बाहर, मजबूरी में सीजनल
देश के बड़े हिस्से में जनसाधारण एक्सप्रेस आज एक स्थायी समाधान न होकर सीजनल व्यवस्था बनकर रह गई है। जबकि हकीकत यह है कि कम लागत में, बिना रिजर्वेशन, लंबी दूरी तय करने वाली पूर्णतया अनारक्षित “जनसाधारण एक्सप्रेस” देश की सबसे बड़ी आबादी की वास्तविक जरूरत को पूरा कर सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक ट्रेनों की तुलना में जनसाधारण एक्सप्रेस का संचालन कहीं अधिक आसान और किफायती है। इसके बावजूद रेलवे बोर्ड और नीति निर्धारकों का ध्यान इस दिशा में बेहद सीमित रहा है।
बिहार मॉडल से क्यों नहीं सीखते अन्य राज्य?
जनसाधारण एक्सप्रेस के संदर्भ में यदि किसी राज्य के जनप्रतिनिधियों ने प्रभावी हस्तक्षेप किया है, तो वह बिहार है।
बिहार रूट पर जनदबाव और राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण अपेक्षाकृत अधिक जनसाधारण और अनारक्षित ट्रेनें देखने को मिलती हैं।
यह सवाल उठता है कि अन्य राज्यों के सांसद और जनप्रतिनिधि इस मुद्दे पर मौन क्यों हैं?
आम जनता की पीड़ा
आम यात्रियों का कहना है कि “सरकार गरीबों की हितैषी होने का दावा करती है, लेकिन असल में सुनवाई सिर्फ बड़े और सक्षम लोगों की होती है। हम तो सिर्फ वोट देने के लिए हैं।”
यह पीड़ा केवल भावना नहीं, बल्कि रेलवे की नीतिगत प्राथमिकताओं का परिणाम है।रेलवे देश की जीवनरेखा है, लेकिन यदि इस जीवनरेखा से आम आदमी ही बाहर होता जाए तो यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि एक सामाजिक अन्याय है।
क्या हो सकता है समाधान?
विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने कुछ व्यावहारिक सुझाव भी दिए हैं—
*राजधानी से राजधानी को जोड़ने वाली दैनिक जनसाधारण एक्सप्रेस
*यात्रियों के अधिक घनत्व वाले शहरों के बीच कम स्टॉपेज वाली पूर्णतया अनारक्षित ट्रेनें
*प्रत्येक प्रमुख रूट पर एक या दो नियमित जनसाधारण एक्सप्रेस का संचालन
यदि इन सुझावों को अमल में लाया जाए, तो यह देश की बहुसंख्यक आबादी के लिए ऐतिहासिक सौगात साबित हो सकता है। नीति-निर्माताओं से अर्थात रेलवे बोर्ड और केंद्र सरकार से अपेक्षा है कि प्रति व्यक्ति आय और सामाजिक संरचना को ध्यान में रखते हुए आधुनिक ट्रेनों के साथ-साथ साधारण किराए वाली जनसाधारण एक्सप्रेस के नियमित और स्थायी विस्तार पर भी गंभीरता से विचार किया जाए।
देश का विकास तभी सार्थक होगा, जब रेलवे की रफ्तार में आम आदमी का सफर भी सुरक्षित और सुलभ हो। रेल की रफ्तार के साथ ही आम आदमी का हक भी तय हो। वरना कहीं ऐसा ना हो कि जनरल बोगी में उठती यह आवाज़ कल जन आंदोलन बनकर पटरियों तक पहुंचेगी।
