देश बड़े विद्रोह और सामाजिक क्रांति की ओर बढ़ता नजर आ रहा है..
नई दिल्ली/ भोपाल बृजराज सिंह। देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और भेदभाव-मुक्त शिक्षा का दावा करने वाला यूजीसी का नया कानून अब खुद सबसे बड़ा भेदभावपूर्ण कानून बनकर सामने आ गया है।
जिस कानून को छात्रों के शोषण, उत्पीड़न और असमानता को खत्म करने के लिए लाया गया था, वही कानून आज सामान्य वर्ग के अधिकारों पर सीधा हमला करता दिखाई दे रहा है।
सबसे बड़ा सवाल: जब समानता की बात है, तो सामान्य वर्ग बाहर क्यों?
नए कानून के तहत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में स्थानीय स्तर पर जांच एवं निगरानी समितियों के गठन का प्रावधान किया गया है, जो भेदभाव और शोषण की जांच करेंगी।
लेकिन हैरान करने वाली और लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली सच्चाई यह है कि इन समितियों में सामान्य वर्ग को प्रतिनिधित्व से पूरी तरह वंचित कर दिया गया है।
यह सिर्फ चूक नहीं, बल्कि सुनियोजित भेदभाव, संवैधानिक अधिकारों की हत्या और एक पूरे वर्ग को दोयम दर्जे का नागरिक घोषित करने की मानसिकता को दर्शाता है।
समानता का कानून या सामाजिक विभाजन का हथियार?
अनुच्छेद 14 की दुहाई देने वाली सरकार को यह बताना होगा कि—क्या सामान्य वर्ग के छात्र शोषण का शिकार नहीं होते?
क्या न्याय केवल चयनित वर्गों का विशेषाधिकार बन चुका है?क्या अब कानून भी “कास्ट-सेलेक्टिव” होंगे?
जिस संविधान के अनुच्छेद 14 की दुहाई देकर यह कानून लाया गया है, उसी संविधान की आत्मा को यह प्रावधान सीधे-सीधे चोट पहुंचाता है। समानता का दावा करने वाला यह कानून सामान्य वर्ग के साथ न केवल भेदभाव करता है,बल्कि नया कानून बनाकर उनके मौलिक अधिकारों की हत्या करने की गहरी साजिश जैसा प्रतीत होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी कानून में किसी एक सामाजिक वर्ग को प्रतिनिधित्व से वंचित किया जाता है तो वह कानून न्यायसंगत नहीं बल्कि पक्षपातपूर्ण माना जाएगा।
यह कानून समानता का ढोल पीट रहा है लेकिन व्यवहार में_ सामान्य वर्ग के साथ खुला, संस्थागत और कानूनी भेदभाव करता है।
नया कानून, नया अत्याचार, नई सामाजिक चिंगारी
देश में पहले ही बेरोजगारी, महंगाई, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता, आरक्षण की असंतुलित व्यवस्था से त्रस्त सामान्य वर्ग अब इसे अपनी आखिरी चोट मान रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों और सामाजिक चिंतकों का मानना है कि देश आगामी बड़े विद्रोह अथवा सामाजिक क्रांति की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। यह असंतोष अब केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहेगा।
सूत्रों के मुताबिक, यूजीसी के इस प्रावधान को लेकर छात्र संगठनों, सामाजिक संगठनों और सामान्य वर्ग के बुद्धिजीवियों में तेज असंतोष पनप रहा है एवं आने वाले दिनों में इसे लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिल सकते हैं। यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ तो यह आक्रोश सड़कों पर उतर सकता है।
इतिहास गवाह है— जब किसी वर्ग को लगातार न्याय से वंचित किया जाता है, जब कानून भी पक्षपाती बन जाते हैं, तब विद्रोह जन्म लेता है, क्रांति होती है।
क्या भाजपा सरकार सामान्य वर्ग के अधिकारों की हत्यारी बनती जा रही है?
“सबका साथ, सबका विकास” का नारा देने वाली भाजपा सरकार से आज देश पूछ रहा है— क्या ‘सबका’ मतलब अब ‘कुछ खास’ ही रह गया है? क्या सामान्य वर्ग को संविधान से बाहर धकेलने की तैयारी हो चुकी है?
यह कानून भाजपा सरकार की नियत और नीति—दोनों पर गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है।
चेतावनी स्पष्ट है: अभी नहीं संभले तो देर हो जाएगी
यदि केंद्र सरकार और यूजीसी ने इस कानून में तत्काल संशोधन नहीं किया, सभी वर्गों को समान प्रतिनिधित्व नहीं दिया, सामान्य वर्ग के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा नहीं की
तो यह कानून देश को सामाजिक टकराव, शिक्षा संस्थानों में उबाल और एक बड़े जनआंदोलन की ओर धकेल सकता है।
अब फैसला सरकार के हाथ में है—समानता बचेगी या साजिश चलेगी? संविधान जिंदा रहेगा या वर्गीय विद्रोह जन्म लेगा ?
फिलहाल ऐसा प्रतीत होता है कि देश के बहुसंख्यक वर्ग से प्रतिनिधित्व करने वाले प्रधानमंत्री सिर्फ वोंटों की खातिर अब देश को वर्ग सघर्ष की खाई में धकेल रहे हैं और वह देश के प्रधानमंत्री नहीं बल्कि एक कैटिगरी का मखौटा बनने जा रहे हैं?
