पेट्रोल वही महँगा, ईंधन कमजोर – सरकार बताए यह सुधार है या लूट ?
नई दिल्ली/ भोपाल 28 जनवरी 2026। देशभर के पेट्रोल पंपों पर अब जनता को जो पेट्रोल मिल रहा है, वह पहले जैसा नहीं रहा। सरकारी आदेशों के तहत पेट्रोल में तय अनुपात में एथेनॉल मिलाया जा रहा है। सरकार इसे “एथेनॉल ब्लेंडिंग” कहती है, लेकिन आम उपभोक्ता इसे सीधे-सीधे मिलावट मान रहा है_ क्योंकि दाम वही हैं, पर माइलेज और गुणवत्ता कम होती जा रही है।
देश की सड़कों पर दौड़ती गाड़ियाँ भले तेज़ दिखें, लेकिन उनकी टंकियों में जो भरा जा रहा है, वह अब पहले जैसा नहीं रहा। सरकारी आदेशों के तहत पेट्रोल में एथेनॉल मिलाया जाने को यद्यपि बड़े गर्व के साथ “हरित क्रांति” बताया जा रहा है लेकिन सवाल यह है कि क्या हरियाली के नाम पर जनता की जेब पर डाका डालना अब सरकारी नीति बन गया है ?
आज पेट्रोल पंप पर खड़ा हर आम नागरिक यह महसूस कर रहा है कि उसकी गाड़ी पहले जितनी नहीं चल रही, माइलेज गिर रहा है, इंजन पर असर पड़ रहा है। लेकिन दाम वही पुराने, बल्कि कई जगह और ज़्यादा। यह संयोग नहीं, नीति का नतीजा है।
एथेनॉल ब्लेंडिंग के नुकसान_जिन पर सरकार चुप
माइलेज घटता है, एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है, E20 पर माइलेज 6–10% तक गिर सकता है।
पुराने वाहनों के लिए यह और अधिक नुकसानदेह है।
2010 से पहले के वाहनों में नुकसान: ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार कई दोपहिया वाहनों में: रबर पार्ट्स खराब होते हैं, फ्यूल लाइन जाम और इंजन पर अतिरिक्त दबाव के चलते इंजन की उम्र घट रही है।
सस्ता घटक मिलाकर महँगा दाम वसूलना किसे कहते हैं?
एथेनॉल पेट्रोल से सस्ता है_ यह सरकार भी जानती है, तेल कंपनियाँ भी और अर्थशास्त्री भी। फिर जब पेट्रोल में 10 से 20 प्रतिशत तक सस्ता एथेनॉल मिलाया जा रहा है, तो सवाल सीधा और कठोर है—पेट्रोल 10–20 प्रतिशत सस्ता क्यों नहीं हुआ?
क्या यह पहली बार है कि उपभोक्ता से पूरी कीमत लेकर उसे आधा-अधूरा उत्पाद थमाया जा रहा है? अगर यही काम कोई दुकानदार करे, तो उसे मिलावटखोर कहा जाएगा। लेकिन जब सरकार करे, तो उसे “नीति सुधार” का तमगा मिल जाता है।
माइलेज गिरा, खर्च बढ़ा – जवाबदेह कौन?
ग्राउंड लेवल पर हकीकत साफ है_माइलेज 6 से 10 प्रतिशत तक गिर रहा है, दोपहिया और पुराने वाहन सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं, सर्विस और मेंटेनेंस का खर्च बढ़ रहा है, यही नहीं इंजन को ठीक-ठाक रखने के लिए 1 लीटर पेट्रोल के साथ ₹10 का ऑयल पाउच मिलाना पड़ रहा है,
लेकिन न सरकार ने पहले बताया, न कोई चेतावनी दी, न किसी तरह की क्षतिपूर्ति की व्यवस्था की। नीति बनी, आदेश निकला और अब इसे जनता भुगत रही है।
ईंधन की टंकी भरने के लिए गरीब की थाली खाली?
एथेनॉल गन्ना, मक्का और चावल से बनता है। यही अनाज गरीब की थाली में जाता है। जब यही अनाज ईंधन के टैंक में डाला जाएगा, तो खाद्यान्न महँगा होगा — यह अर्थशास्त्र का पहला पाठ है।
तो सवाल यह नहीं कि एथेनॉल चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि_क्या देश की प्राथमिकता गाड़ी चलाना है या पेट भरना?
ग्रीन एनर्जी या ग्रीन मुनाफा — सच क्या है?
सरकार पर्यावरण का हवाला दे रही है लेकिन हकीकत यह है कि_सार्वजनिक परिवहन बदहाल है, इलेक्ट्रिक वाहन आम आदमी की पहुँच से बाहर हैं और पेट्रोल में मिलावट को हरित नीति बताया जा रहा है। अगर यही पर्यावरण प्रेम है तो फिर—बसें क्यों नहीं बढ़ीं? रेल क्यों महँगी हुई? ई-वाहन पर सब्सिडी आम आदमी तक क्यों नहीं पहुँची?
जनता से पूछे बिना नीति, लोकतंत्र नहीं तानाशाही
लोकतंत्र में नीतियाँ जनता की सहमति से बनती हैं, फरमान से नहीं। अगर एथेनॉल सच में जनता के हित में है तो_कीमत घटाइए, नुकसान की जिम्मेदारी लीजिए और उपभोक्ता को विकल्प दीजिए वरना यह मानना पड़ेगा कि ‘एथेनॉल नीति’ जनता के लिए नहीं, आंकड़ों और मुनाफे के लिए है।
देश सबसे बड़ा सवाल सरकार से पूछ रहा है_ *क्या पेट्रोल सस्ता होगा?
* क्या खराब होते इंजनों की जिम्मेदारी ली जाएगी?
* या हर नीति की तरह यहाँ भी जनता से कहा जाएगा_ समझौता करो?
इतिहास गवाह है जब जनता को लगातार कमजोर उत्पाद और महँगा बोझ दिया जाता है तो सवाल सड़कों तक पहुँचते हैं और तब ड्रोन नहीं, जवाब काम आते हैं।
