पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन के आलोक निगम पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के गंभीर आरोप
भोपाल। मध्यप्रदेश पुलिस हाउसिंग एवं इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन में तैनात वरिष्ठ अधिकारियों के बीच इन दिनों एक नाम सबसे अधिक चर्चा में है—परियोजना यंत्री एवं प्रभारी अधीक्षण यंत्री आलोक निगम। जुलाई 2026 में सेवानिवृत्त होने जा रहे आलोक निगम की कथित सेवा-वृद्धि (एक्सटेंशन) की तैयारियों के बीच उनके कार्यकाल से जुड़े कई पुराने और गंभीर विवाद फिर सुर्खियों में आ गए हैं।
सूत्रों के अनुसार_आलोक निगम के विरुद्ध लोकायुक्त में कई शिकायतें एवं प्रकरण दर्ज होने के बावजूद इसकी सेवा-विस्तार का प्रस्ताव तैयार करने की कवायद चल रही थी, लेकिन इसी दौरान उनके कार्यकाल से जुड़े कई मामलों की फाइलें और दस्तावेज चर्चा का विषय बन गए। आरोप है कि सेवा-वृद्धि का मार्ग प्रशस्त करने के लिए पुराने विवादित मामलों को दबाने अथवा रिकॉर्ड से हटाने के प्रयास भी किए गए।
बरघाट कांस्टेबल क्वार्टर कांड फिर चर्चा में
जानकारी के अनुसार वर्ष 2017 में सिवनी जिले के बरघाट में निर्मित आठ कांस्टेबल आवासों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठे थे। आरोप है कि निर्माण कार्य में भारी अनियमितताओं के कारण आवास ध्वस्त हो गए थे। उस समय आलोक निगम सहायक यंत्री के पद पर रहते हुए निर्माण कार्य की माप-पुस्तिका, सुपरविजन और गुणवत्ता परीक्षण से जुड़े दायित्वों का निर्वहन कर रहे थे।
सूत्रों का दावा है कि घटना के बाद क्षतिग्रस्त भवनों का मलबा हटाकर पूरे प्रकरण के भौतिक साक्ष्य समाप्त कर दिए गए। आरोप यह भी है कि लगभग दो करोड़ रुपये की सरकारी क्षति होने के बावजूद वित्तीय उत्तरदायित्व तय करने और संबंधित विभागों को सूचना भेजने की प्रक्रिया प्रभावी रूप से नहीं अपनाई गई। इस मामले में उत्तरदायित्व निर्धारण और संभावित वसूली की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है।
किराये के वाहनों में करोड़ों के खेल का आरोप
आलोक निगम के भोपाल संभाग क्रमांक-1 में परियोजना यंत्री के रूप में कार्यकाल (2021 से 2024) को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार इस अवधि में किराये के वाहनों के अनुबंधों में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं हुईं।
आरोप है कि निगम की ब्लैकलिस्ट श्रेणी में आने वाले वाहन प्रदाता के वाहन उपयोग में लिए गए, कई पुराने और निजी श्रेणी के वाहन अनुबंधित नियमों के विपरीत संचालित किए गए तथा टैक्सी परमिट संबंधी शर्तों की अनदेखी की गई। इतना ही नहीं, अनुबंध की शर्तों के अनुसार ईंधन और करों का भार वाहन प्रदाता पर होना चाहिए था, लेकिन कथित रूप से इसका वित्तीय दायित्व निगम पर डाल दिया गया।
सूत्रों का दावा है कि जीएसटी प्रावधानों और अनुबंध शर्तों में कथित छेड़छाड़ के कारण निगम को करोड़ों रुपये की आर्थिक क्षति पहुंची, जबकि वाहन प्रदाताओं को अनुचित लाभ मिला। इस पूरे मामले में करीब चार करोड़ रुपये की वित्तीय गड़बड़ी की चर्चा विभागीय गलियारों में लंबे समय से होती रही है।
नए प्रबंधन के सामने नहीं चली पुरानी रणनीति?
सूत्र बताते हैं कि वर्तमान प्रबंध संचालक अनंत कुमार सिंह नियम-कायदों के प्रति सख्त और पारदर्शी कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। माना जा रहा है कि निगम में जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन को लेकर अपनाए गए कड़े रुख के कारण सेवा-वृद्धि की संभावनाएं कमजोर पड़ गई हैं। श्री कुमार ऐसे कथित कारनामों को अंजाम देने वाले किसी भी “विक्रम अथवा बेताल” को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं दिख रहे हैं।
अंदरखाने यह चर्चा भी है कि बरघाट आवास प्रकरण और वाहन अनुबंध मामलों में यदि जिम्मेदारी तय होती है तो संबंधित अधिकारियों से वित्तीय वसूली की कार्रवाई भी हो सकती है। इसी कारण सेवा-विस्तार के सपने देखने वाले कुछ अधिकारियों की चिंता बढ़ गई है।
कॉर्पोरेशन के भीतर इन दिनों सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विवादों और आरोपों से घिरे अधिकारियों को सेवा-वृद्धि का लाभ मिलेगा, या फिर लंबित मामलों की निष्पक्ष जांच कर जवाबदेही तय की जाएगी। सूत्रों की माने तो आने वाले दिनों में इस मामले को लेकर कई और तथ्य सामने आ सकते हैं।
