“चाल में आक्रामकता, चरित्र में अहंकार और चेहरे पर सत्ता का नशा_ विजयवर्गीय का आईना”
भोपाल/इंदौर। दूषित पानी पीने से लोगों की मौतें हों, पीड़ित परिवारों का आक्रोश हो या मीडिया के सीधे सवाल—हर मोर्चे पर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का चेहरा एक जैसा ही दिखाई देता है : संवेदनहीनता, झल्लाहट और सत्ता का अहंकार।
एनडीटीवी के पत्रकार द्वारा जब मौतों पर सवाल पूछा गया, तो जवाब में न कोई दुख झलका, न जिम्मेदारी का बोध—बल्कि सामने आया बदसलूकी भरा रवैया। यह घटना केवल एक पल की चूक नहीं, बल्कि उस राजनीतिक चरित्र का प्रतिबिंब है, जो वर्षों से बार-बार सामने आता रहा है।
जनता मरे, सवाल पूछे जाएं—तो मंत्री असहज क्यों?..
एक जनप्रतिनिधि से अपेक्षा होती है कि वह_
संकट में संवेदना दिखाए
सवालों का जवाब दे
और जिम्मेदारी स्वीकार करे
लेकिन मंत्री विजयवर्गीय के व्यवहार में बार-बार यह देखने को मिलता है कि सवाल उन्हें चुभते हैं और जवाब देने के बजाय वे तिरस्कार चुनते हैं। पत्रकार के सवालों पर तिलमिलाते हुए मंत्री के मुंह से संविधान नहीं बल्कि सत्ता बोलते दिखी।
सत्ता में रहते हुए मर्यादा बोझ क्यों लगती है?..
चुनाव हो या आपदा—मंत्री का सार्वजनिक आचरण अक्सर
पार्टी अनुशासन से बाहर लोकतांत्रिक मर्यादाओं से परे
और संवैधानिक जिम्मेदारी से कटा हुआ दिखाई देता है।
यही कारण है कि उनका नाम अक्सर विवादों, बयानों और बदतमीजी के संदर्भ में लिया जाता है, न कि संवेदनशील प्रशासन या जवाबदेही के उदाहरण के रूप में। जबकि मुख्यमंत्री की शोहरत के सपने सजोने वाले विजयवर्गीय में अब मंत्री पद का सलीका नहीं दिखता, भले ही वह उनके किसी फ्रस्ट्रेशन का नतीजा हो !
चाल : आक्रामकता, चरित्र : अहंकार, चेहरा : सत्ता का नशा..
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि अब विजयवर्गीय में आलोचना सहने का धैर्य रहा। मीडिया को आईना नहीं बल्कि दुश्मन समझना और जनता को जवाबदेह नहीं, अधीन मानना_यही इनका असली चाल-चरित्र-चेहरा है जो बार-बार उजागर होता रहा है। आज मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के सामने आईना रखा है—
अब सवाल यह नहीं कि आईना झूठा है या नहीं,
सवाल यह है कि चेहरा सच देखना चाहता है या नहीं।
लोकतांत्रिक ढांचे की संवैधानिक हदें..
लोकतंत्र में सत्ता किसी की निजी जागीर नहीं होती। दूषित पानी से हुई मौतें- किसी बयान से छोटी नहीं होतीं और पत्रकार के सवाल किसी साजिश से नहीं बल्कि लोकतंत्र के अधिकार का हिस्सा है जिसका जवाब देना मंत्री की जम्मेदारी है। जनता मरी तो मंत्री चुप, सवाल पूछे तो भड़के—क्या यही जनसेवा है !“दूषित पानी से मौतें हुईं, मंत्री को गुस्सा सवालों पर आया”
इंदौर सहित पूरे प्रदेश की जनता का भाजपा के आलाकमान से इस ज्वलंत मुद्दे पर यह बड़ा सवाल है कि_ देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस मंत्री की संवैधानिक सरहदें क्या है ?
