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लोकायुक्त की मिलीभगत से सौरभ शर्मा एवं अन्य को मिली जमानत

लोकायुक्त की भूमिका पहरेदार की बजाय हिस्सेदारी की..

भाजपा सरकार और सिस्टम पर सवालिया निशान..

भोपाल 2 अप्रैल 2025। मध्यप्रदेश के बहुचर्चित आय से अधिक संपत्ति मामले में परिवहन विभाग के पूर्व आरक्षक सौरभ शर्मा एवं अन्य को लोकायुक्त कोर्ट से जमानत मिल गई है। हालांकि प्रवर्तन निदेशालय (ED) के मामले में जमानत न मिलने के कारण ये तीनों अभी भोपाल सेंट्रल जेल में ही रहेंगे। ईडी द्वारा दर्ज प्रिवेंशन ऑफ करप्शन मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के मामले में 10 तारीख तक चालान पेश करना है अगर ऐसा नहीं हुआ तो यहां भी जमानत मिल सकती है और फिर तीनों जेल से बाहर आ सकेंगे।

प्रावधानुशार 10 साल की सजा से कम सजा वाले मामलों में 60 दिन के भीतर चालान पेश करना होता है और इससे अधिक सजा वालों में 90 दिन की समय सीमा निर्धारित है। जिसकी जानकारी पुलिस विभाग के छोटे से कर्मचारी तक को होती है ऐसी स्थिति में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी एवं लोकायुक्त के महानिदेशक जयदीप प्रसाद का इससे अनभिज्ञ होना एक बड़ा सवाल है? बता दें कि इससे पहले न्यायालय ने सौरभ शर्मा की जमानत यचिका खारिज कर दी थी क्योंकि उस समय  याचिकाकर्ता के पास जमानत लेने का कोई आधार नहीं था। लिहाजा लोकायुक्त के साथ-साथ गांठ करके 60 दिन तक चालन न पेश करने का ग्राउंड तैयार किया गया और इसी तैयार किए ग्राउंड पर आज लोकायुक्त कोर्ट ने सौरभ शर्मा, चेतन गौर एवं शरद जायसवाल की जमानत मंजूर कर ली।

इससे साफ जाहिर है कि लोकायुक्त द्वारा न सिर्फ जमानत दिलवाने में इन आरोपियों की मदद की है बल्कि पूरे केस पर ही पलीता लगाने के संकेत भी दे दिए हैं। जहां एक ओर लोकायुक्त डीजी जयदीप प्रसाद का हटना या हटाया जाना महज एक ड्रामा का हिस्सा माना जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर खुफिया गलियारों में यह भी चर्चा है कि श्री प्रसाद पूरी कार्यवाही को निष्पक्षता के साथ अंजाम तक पहुंचाने के लिए अड़े हुए थे लिहाजा चालान की 60 दिन की अवधि पूर्ण होने ( 28 मार्च) से पहले ही 23 मार्च को इन्हे हटा हटा दिया गया।

60 दिनों में चालान पेश न कर पाने की यह नाकामी कोई संयोग नहीं बल्कि एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा है। इस पूरे प्रकरण में लोकायुक्त की संदिग्ध भूमिका और सरकार की चुप्पी जनता के सामने सच्चाई को उजागर कर रही है। इस हाईप्रोफ़ाइल मामले की जांच के दौरान लोकायुक्त महानिदेशक जयदीप प्रसाद का अचानक ट्रांसफर इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि सरकार इस मामले को दबाने में जुटी है। बता दें कि जयदीप प्रसाद ने ही सौरभ शर्मा के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज कर छापेमारी की थी, इसके बावजूद इन्हें हटाना यह स्पष्ट करता है कि बड़े रसूखदारों को बचाने के लिए सरकार किसी भी हद तक जा सकती है। सूत्र अनुसार इन रसूकदारों में न सिर्फ विभागीय आरटीआई तुमराम,किशोर सिंह, कुछ पूर्व अपर आयुक्त, पूर्व आयुक्त जैसे कई अधिकारी एवं पूर्व विभागीय मंत्रियों के नाम होना बताया जा रहा है। बता दें कि सौरभ शर्मा के साथ तुमराम एवं किशोर सिंह बघेल मिलकर पिछले कई वर्षों से मध्य प्रदेश के परिवहन विभाग को सिंडिकेट की तरह चला रहे थे जिसमें एक-एक के पास कई चेक पोस्टों पर अपने डमी कैंडिडेट नियुक्त करके नियंत्रण रखते हए अवैध वसूली के रूप में बेशुमार बेनामी संपत्ति अर्जित की। इनमें से सिर्फ सौरभ शर्मा ही अभी तक पकड़ में आ पाया है।

मध्यप्रदेश में लोकायुक्त और सरकार की मिलीभगत से भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने का ये सिलसिला लंबे समय से जारी है। जहां लोकायुक्त अधिकांश मामलों में भ्रष्टाचारियों को बचाने का काम करती आ रही है और कदाचित कार्रवाई की इच्छा होने पर सरकार अभियोजन की अनुमति रोककर अपराधियों की ढाल बन जाती है।

भले ही लोकायुक्त की जांच एजेंसी के रूप में पहरेदार जैसी भूमिका है मगर इस तरह के मामले के बाद अब जांच एजेंसी की भूमिका पहरेदार की बजाय हिस्सेदार जैसी दिख रही है। जिस लोकतांत्रिक देश में पहरेदार ही हिस्सेदार बन जाएं और रक्षक ही भक्षण करने लगेंगे, उस गणराज्य के लोकतंत्रात्मक ढांचे का भगवान राम ही मालिक है ? इन हालातो में यह कहना मुनासिब लगता है कि भाजपा की डबल इंजन सरकार सुशासन के लिए नहीं बल्कि भ्रष्टाचार की रेल चलाने के लिए बनी है !