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भारत हिंदू राष्ट्र बनने की ऐतिहासिक दिशा में

सभ्यता, संस्कृति और संविधान की आत्मा का पुनर्जागरण

हिंदू राष्ट्र का विचार — डर नहीं, एक दिशा है

नई दिल्ली 9 जनवरी 2026। हज़ारों वर्षों की सनातन सभ्यता, सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रबोध के साथ भारत अब उस स्वाभाविक सत्य की ओर लौटता दिखाई दे रहा है, जिसे इतिहास, जनसंख्या संरचना और सांस्कृतिक चेतना लंबे समय से इंगित करती रही है — भारत एक हिंदू राष्ट्र है और भविष्य में और अधिक सशक्त रूप से स्वयं को उसी रूप में स्थापित कर रहा है।

भारत को लेकर दशकों तक एक ऐसा वैचारिक दबाव बनाया गया, मानो अपनी सभ्यता, संस्कृति और बहुसंख्यक समाज की पहचान को स्वीकार करना कोई अपराध हो। “धर्मनिरपेक्षता” के नाम पर देश को उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों से काटने का प्रयास किया गया। आज जब भारत उस भ्रम से बाहर निकल रहा है, तो यह प्रश्न उठ रहा है — क्या भारत हिंदू राष्ट्र बनने की ओर बढ़ रहा है?
सच यह है कि भारत कहीं जा नहीं रहा, बल्कि वापस लौट रहा है — अपनी आत्मा की ओर।

सभ्यता को नकार कर राष्ट्र नहीं बनते

भारत कोई 1947 में जन्मा राष्ट्र नहीं है। यह एक हज़ारों वर्षों पुरानी सभ्यता है, जिसकी पहचान सनातन संस्कृति से रही है। जिस देश की लगभग 80 प्रतिशत आबादी हिंदू हो, जहाँ के पर्व, परंपराएँ, दर्शन, जीवनशैली और सामाजिक मूल्य हिंदू चेतना से निकले हों — वहाँ राज्य की पहचान उस संस्कृति से अलग रखने का प्रयोग स्वाभाविक रूप से अस्थायी ही हो सकता था।
आज जो परिवर्तन दिख रहा है, वह किसी धर्म को थोपने का नहीं, बल्कि सभ्यतागत सत्य को स्वीकार करने का साहस है।

राम मंदिर: आस्था नहीं, आत्मसम्मान

अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय के सुधार का प्रतीक है। यह केवल मंदिर नहीं, बल्कि हिंदू अस्मिता, ऐतिहासिक न्याय और राष्ट्र गौरव की पुनर्स्थापना है। यह उस भारत का आत्मसम्मान है, जिसने सदियों तक प्रतीक्षा की, संघर्ष किया और अंततः संविधान व न्यायपालिका के माध्यम से अपना मार्ग पाया।

प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन ने यह स्पष्ट कर दिया कि राज्य और सभ्यता अब आमने-सामने नहीं, साथ-साथ हैं। राज्य का इसमें सहभागी होना यह संकेत देता है कि अब भारत अपनी आस्था से शर्मिंदा नहीं बल्कि गौरवान्वित है।

CAA और UCC: वैचारिक स्पष्टता का साहस

नागरिकता संशोधन कानून ने पहली बार यह स्वीकार किया कि भारत की एक सभ्यतागत जिम्मेदारी भी है — विशेषकर उन हिंदुओं के प्रति, जो पड़ोसी देशों में प्रताड़ित हुए। यह कोई भेदभाव नहीं, बल्कि ऐतिहासिक यथार्थ की स्वीकारोक्ति है।
समान नागरिक संहिता भी उसी दिशा में कदम है —
एक राष्ट्र, एक कानून, जहाँ सामाजिक समानता और राष्ट्रीय एकता सर्वोपरि हो।

शिक्षा और संस्कृति: जड़ों से जुड़ने का प्रयास

इतिहास और शिक्षा में किए गए बदलावों को लेकर आलोचना हो सकती है, लेकिन यह भी सच है कि भारत अब विदेशी दृष्टिकोण से नहीं बल्कि भारतीय दृष्टि से स्वयं को देखना चाहता है। योग, आयुर्वेद, संस्कृत और भारतीय दर्शन को बढ़ावा देना —यह आधुनिकता से पीछे जाना नहीं, बल्कि अपनी ताकत को पहचानना है।

यह स्पष्ट होना चाहिए कि हिंदू राष्ट्र का अर्थ थिओक्रेसी नहीं, न ही किसी समुदाय का दमन और न ही नागरिक अधिकारों का हनन है। हिंदू राष्ट्र का अर्थ है: एक ऐसा राष्ट्र जहाँ बहुसंख्यक संस्कृति राष्ट्र की दिशा तय करे, लेकिन अल्पसंख्यकों को सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर मिले। यह वही हिंदू दर्शन है, जो “सर्वे भवन्तु सुखिनः” में विश्वास करता है।

विश्वास से आगे बढ़ता भारत आज एक मानसिक गुलामी से मुक्त हो रहा है। हिंदुस्तान अपने इतिहास से डर नहीं रहा_अपनी पहचान से भाग नहीं रहा। हिंदू राष्ट्र की ओर बढ़ना किसी के खिलाफ नहीं बल्कि भारत के पक्ष में खड़ा होना है। यह परिवर्तन राजनीतिक नहीं, सभ्यतागत है।
और सभ्यताओं की वापसी को रोका नहीं जा सकता। भारत का हिंदू राष्ट्र बनना उसकी आत्मा की ओर वापसी है।