युगक्रांति का आक्रामक एक्सपोज़े: आदेशों को रौंदने की ज़िद, सिस्टम को ठेंगा
भोपाल 5 जनवरी 2026। मप्र पुलिस हाउसिंग कॉरपोरेशन के अध्यक्ष- सह प्रबंध संचालक अजय शर्मा का आचरण अब महज़ एक प्रशासनिक जिद नहीं, बल्कि खुले तौर पर आदेशों की अवहेलना और सत्ता के दुरुपयोग का प्रतीक बन चुका है। शर्मा -संदल मामला युग क्रांति की सुर्ख़ियों में पिछले कई महीनों से है जो एक नए मोड़ पर है।
लोक निर्माण विभाग (PWD) से प्रतिनियुक्त मैकेनिकल सब-इंजीनियर के.के. संदल को तत्काल रिलीव कर पीडब्लूडी मुख्यालय में उपस्थित कराने के स्पष्ट निर्देश—मुख्य अभियंता केपीएस राणा और PWD सचिव की चेतावनियों सहित—काग़ज़ों तक सीमित कर दिए गए। दंडात्मक कार्रवाई की चेतावनी के बावजूद आदेशों को ठेंगा दिखाया गया।
चाल: काग़ज़ों से खेल, विभाग को गुमराह
2 जनवरी 2026 को गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव को लिखा गया पत्र इस बात का प्रमाण है कि अजय शर्मा ने तथ्य छुपाकर, आधे-सच के सहारे, विभाग को गुमराह करने की कोशिश की। सिंहस्थ उज्जैन की तैयारियों की आड़ लेकर संदल को ‘अपरिहार्य’ बताना एक सोची-समझी चाल है—जबकि वास्तविकता यह है कि विद्युत योग्यता शून्य व्यक्ति को पहले ही तीन-तीन संभागों का परियोजना यंत्री (विद्युत कार्य) जैसा गलत कार्यभार सौंपा जा चुका है।
चरित्र: नियमों की हत्या, अपात्र को संरक्षण
कॉरपोरेशन में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में B.Tech और M.Tech डिग्रीधारी कई इंजीनियर उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें लूप लाइन में डालना और अपात्र को आगे बढ़ाना—यह प्रशासनिक अनैतिकता का क्लासिक उदाहरण है। तकनीकी मानकों, सेवा नियमों और आचरण संहिता—तीनों की धज्जियां उड़ाई गईं। यह सवाल अब टलने वाला नहीं कि किसके इशारे पर और किसके हित में यह संरक्षण दिया जा रहा है?
चेहरा: सार्वजनिक जिम्मेदारी बनाम निजी निष्ठा
काग़ज़ों में “दोहरी जिम्मेदारी अध्यक्ष -सह प्रबंध संचालक” का चेहरा, लेकिन ज़मीन पर आदेश तोड़ने वाला संरक्षक—यही अजय शर्मा का असली चेहरा है। सिंहस्थ जैसे महाआयोजन को ढाल बनाकर मनमानी करना, योग्य अफसरों को हाशिए पर धकेलना, विभागीय चेतावनियों को नज़रअंदाज़ करना और विद्युत की शून्य योग्यता वाले व्यक्ति पर मोहित होना_ सार्वजनिक हित के खिलाफ है।
रिश्तों की परतें: शोध का विषय
इतना व्यापक पत्राचार इस बात का संकेत ही नहीं बल्कि इस आशय को प्रमाणित करता है कि अजय शर्मा और के.के. संदल के बीच संबंध साधारण नहीं है, इस पर भांति- भांति की चर्चाएं विभागीय गलियारों में कई दिनों से जोरों पर है।
नीलबड़ में शर्मा एवं दानिश हिल में उनके निजी सहायक रवि मिश्रा के निर्माणाधीन निजी विला में चल रहे विद्युत कार्यों की जिम्मेदारी, निजी सहायक रवि मिश्रा की भूमिका, या विभाग के भीतर चल रहा कोई गोरखधंधा अथवा अंतरंग कोई वजह —कई परतें हैं। यह शोध का विषय है जिनकी निष्पक्ष जांच ज़रूरी है। अपुष्ट सूूत्रों से यह भी ज्ञात हुआ है कि ‘भागते भूत की लंगोटी‘ की तरह मिश्रा जी अब संदल का दोहन कर रहेे हैं।
सवाल जो शासन से जवाब मांगते हैं_ स्पष्ट विभागीय आदेशों की अवहेलना पर जवाबदेही किसकी ? गृह विभाग को गुमराह करने के आरोपों पर तत्काल जांच क्यों नहीं? योग्य इंजीनियरों को उनका वैध कार्यभार कब मिलेगा?
युग क्रांति यह स्पष्ट करता है कि नियमों से ऊपर कोई नहीं। दस्तावेज़ों और तथ्यों के आधार पर यह लड़ाई जारी रहेगी—जब तक सत्ता के दुरुपयोग पर पर्दा डालने की हर कोशिश बेनकाब न हो जाए।
